एक साथ अनेक शरीर धारण करने का रहस्य

nilesh
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निर्माणकाय सिद्धि: एक साथ अनेक शरीर धारण करने का रहस्य

 क्या एक साथ कई शरीरों में रहना संभव है? जानिए योग की निर्माणकाय सिद्धि का रहस्य – कृष्ण, सौभरि ऋषि और शंकराचार्य के प्रमाणों के साथ।



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निर्माणकाय सिद्धि : एक साथ अनेक शरीर धारण करने का वह रहस्य जिसे विज्ञान आज भी नहीं समझ पाया

 वह प्रश्न जो जिज्ञासा जगाता है

सोचिए…

एक ही समय में, एक ही व्यक्ति – सोलह हज़ार स्थानों पर, सोलह हज़ार स्त्रियों के साथ। यह कोई काल्पनिक फिल्म का दृश्य नहीं है। यह श्रीकृष्ण की रासलीला का वर्णन है।

लेकिन क्या यह केवल एक धार्मिक कथा है? या फिर इसके पीछे कोई गहन योग-वैज्ञानिक सत्य छिपा है?


तंत्रशास्त्र और योगदर्शन का उत्तर है – यह संभव है। इस सिद्धि का नाम है ‘निर्माणकाय’ या ‘कायव्यूह’। यह वह क्षमता है जिससे एक साधक अपनी इच्छा से अनेक शरीर धारण कर सकता है, और एक ही समय में भिन्न-भिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्य कर सकता है।


आइए, इस रहस्यमय सिद्धि के वैज्ञानिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष को समझते हैं।


निर्माणकाय क्या है? – एक परिभाषा

‘निर्माणकाय’ का शाब्दिक अर्थ है – ‘निर्मित किया गया शरीर’।

महाभारत के अनुशासन पर्व की टीका में नीलकण्ठ ने स्पष्ट कहा है:

“निर्माणकाय – अनेकधा भवनम्, योगेन अनेकशरीरधारणम्।”

अर्थात – योगबल से अनेक शरीर धारण करना ही ‘निर्माणकाय’ या ‘निर्माणचित्त’ कहलाता है।

महायान साहित्य में ‘सम्भोगकाय’ और ‘निर्माणकाय’ का भेद किया गया है:


सम्भोगकाय – अपने निजी प्रयोजन के लिए


निर्माणकाय – दूसरे जीवों के कल्याण के लिए


 पौराणिक प्रमाण – जब एक अनेक हो गया

  श्रीकृष्ण की रासलीला – 16,000 रूप

श्रीमद्भागवत के अनुसार, जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही श्रीकृष्ण थे:

“देहे स्व भगवान् ताभिरासमारूढमीश्वरः। लीलया।”

‘लीलया’ पद से ‘निर्माणकाय’ का ही संकेत लक्षित किया गया है। द्वारका पुरी में भी – सोलह हज़ार रानियों के भवन में एक साथ श्रीकृष्ण विद्यमान थे।


ऋषि सौभरि की अनोखी कथा

सौभरि नामक ऋषि ने राजा मान्धाता की पाँच सौ कन्याओं से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। किंतु एक शरीर से पाँच सौ कन्याओं का पति बनना असंभव था। इसलिए उन्होंने अपने योगबल से पाँच सौ रूप धारण किए – और एक ही समय में पाँच सौ कन्याओं के साथ रमण किया।


 नारद का श्वेतद्वीप दर्शन

महाभारत में वर्णित है कि नारद मुनि ने श्वेतद्वीप में जाकर भगवान के ‘मायाखण्ड’ (निर्माणकाय) के दर्शन किए।


 योग और दर्शनशास्त्र की व्याख्या

 पातंजल योगसूत्र का दृष्टिकोण

‘सोपक्रम’ और ‘निरपक्रम’ – दो प्रकार के कर्म बताए गए हैं। योगी अपने ‘सोपक्रम’ (फल देने में सक्षम) कर्मों का अनुभव करने के लिए अनेक शरीर धारण करता है। तत्पश्चात् वह अपनी इच्छा से मरता है – इच्छामृत्यु।


 शंकराचार्य का मत

ब्रह्मसूत्र (4.4.15) के भाष्य में शंकराचार्य कहते हैं:


“योगियों की भाँति देवताओं में भी ‘कायव्यूह-सम्पत्ति’ देखी जाती है, जिससे वे एक ही समय में अनेक यज्ञों में यज्ञ-भाग लेने के लिए उपस्थित रहते हैं।”


 वाचस्पति मिश्र और भामती

वाचस्पति मिश्र ने ‘भामती’ की टीका (4.1.11) में लिखा है कि देवताओं के शरीर सामान्य मनुष्यों की तरह माता-पिता के संयोग से नहीं, बल्कि इच्छामात्र से, साक्षात् महाभूतों से उत्पन्न होते हैं। उनका ज्ञान एकदेशीय या एककालिक नहीं होता।


 न्यायशास्त्र का दृष्टिकोण

न्यायशास्त्र के अनुसार, निर्माणकाय की उत्पत्ति में परमाणु उपादान कारण होते हैं। प्रत्यक्षज्ञादर्शन में आचार्य अभिनवगुप्त ने भी यही कहा कि पूर्व-निर्मित परमाणु ही उपादान हैं।


 कैसे बनता है निर्माणकाय? – प्रक्रिया का रहस्य

योगशास्त्र के अनुसार, जब साधक चित्त की वृत्तियों पर पूर्ण संयम प्राप्त कर लेता है, तब वह इच्छानुसार शरीरों का निर्माण कर सकता है।


प्रक्रिया के मुख्य बिंदु:


पंचमहाभूतों पर विजय – साधक पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश – सबको अपने वश में कर लेता है

‘प्रयोजक चित्त’ – यह वह चित्त है जो अनेक शरीरों का निर्माण और संचालन करता है

ये शरीर ‘मायिक’ (प्रतीत होने वाले) नहीं, बल्कि वास्तविक होते हैं – दूसरे उन्हें देख और स्पर्श कर सकते हैं


 निर्माणकाय सिद्धि को लेकर भ्रम

 “यह केवल एक काल्पनिक धारणा है”


तथ्य: शंकराचार्य, वाचस्पति मिश्र, अभिनवगुप्त – जैसे तर्कशास्त्री और योगी इस सिद्धि को मानते हैं। यह केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि योग-दर्शन का एक सिद्ध सत्य है।


 “कोई भी योगी कभी ऐसा नहीं कर सका”


तथ्य: पुराणों, महाभारत और योग-ग्रंथों में इसके अनेक प्रमाण हैं। कृृष्ण, सौभरि, नारद – ये कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि ऐतिहासिक/पौराणिक व्यक्तित्व हैं।


  “निर्माणकाय केवल देवताओं के लिए है”

तथ्य: पातंजल योगसूत्र के अनुसार सिद्ध योगी भी इसे प्राप्त कर सकता है। शर्त है – चित्त की पूर्ण एकाग्रता और पंचमहाभूतों पर विजय।


 आधुनिक विज्ञान क्या कहता है?

आधुनिक विज्ञान अभी ‘एक साथ अनेक स्थानों पर उपस्थिति’ (Multi-location) को क्वांटम भौतिकी के दायरे में रखता है। क्वांटम एंटैंगलमेंट सिद्धांत कहता है – दो कण एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं, चाहे वे ब्रह्मांड के दो छोर पर क्यों न हों।


लेकिन चेतना के एक साथ अनेक शरीरों में विद्यमान रहने का प्रश्न अभी विज्ञान की पहुँच से बाहर है।


तंत्रशास्त्र कहता है – जब चित्त अपने भौतिक आवरणों से मुक्त हो जाता है, तब वह एक साथ अनेक स्थानों पर क्रियाशील हो सकता है। यही निर्माणकाय सिद्धि है।


 शरीर सीमा नहीं, चेतना की अभिव्यक्ति है

सोचिए…


आप एक ही समय में अपने घर में हैं, अपने ऑफिस में हैं, किसी मंदिर में हैं – और किसी को पता भी नहीं चलता कि यह आप ही हैं। यह कोई साइंस फिक्शन नहीं है। यह निर्माणकाय सिद्धि का वह स्वरूप है, जिसे प्राचीन योगियों ने सिर्फ कल्पना नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव किया था।


जब तक चित्त शरीर से बंधा रहता है, तब तक हम ‘एक समय में एक स्थान’ तक सीमित हैं। जब चित्त परमाणुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, तब वह ‘एक समय में अनेक स्थानों’ पर विस्तृत हो जाता है।


सौभरि ऋषि ने पाँच सौ रूप धारण किए। कृष्ण ने सोलह हज़ार। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं – यह योगबल का चरम उदाहरण है।


  कर्म और समय का सत्य

यदि आपके कर्म अधूरे हैं, यदि आपको अनेक शरीरों में रहकर अनेक जीवन भोगने हैं – तो प्रकृति आपको बार-बार जन्म देगी। परन्तु यदि आपने योगबल प्राप्त कर लिया, तो आप एक ही जीवन में, एक ही समय में अनेक जन्मों के कर्मों का फल भोग सकते हैं।


यही निर्माणकाय सिद्धि का चरम लक्ष्य है – कर्मों का त्वरित निराकरण। और यही काल (समय) को जीतने का योगियों का गुप्त सूत्र है।


  पाठकों से संवाद

क्या आपने कभी ऐसा कोई अनुभव किया है, जहाँ एक ही व्यक्ति दो जगह एक साथ दिखाई दिया हो?


क्या आप सोचते हैं कि निर्माणकाय सिद्धि वास्तव में संभव है, या केवल एक पौराणिक कल्पना?


क्या आपने कभी योग या तंत्र की किसी सिद्धि का अनुभव किया है?


नीचे कमेंट में अपना अनुभव साझा करें।

हम आपके अनुभवों को KaalTatva.in के अगले ‘योग सिद्धियाँ’ लेख में शामिल कर सकते हैं (आपकी अनुमति से)।


इस लेख को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ – ताकि निर्माणकाय सिद्धि को ‘असंभव’ नहीं, बल्कि ‘अत्यंत दुर्लभ’ के रूप में देखा जाए।


 

 चेतावनी (Warning)


सूचना का उद्देश्य: यह लेख शैक्षणिक, ऐतिहासिक एवं शोध उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। यह किसी भी प्रकार की सिद्धि प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता।


बिना गुरु के साधना न करें: निर्माणकाय सिद्धि जैसी उच्च योग-सिद्धियों को बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन में प्राप्त करने का प्रयास मानसिक असंतुलन का कारण बन सकता है। लेखक या वेबसाइट किसी भी प्रतिकूल प्रभाव के लिए उत्तरदायी नहीं होगी।


चिकित्सीय चेतावनी: यदि आप मानसिक रोग (स्किजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर, साइकोसिस) से पीड़ित हैं, तो बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई साधना न करें।


व्यक्तिगत जिम्मेदारी: इस जानकारी का उपयोग करने वाला पाठक पूर्णतः अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर करेगा।


  लेखक क्रेडिट (Author Credit)

प्रेरणा स्रोत: 

पंडित देवदत्त शास्त्री कृत “तंत्र सिद्धांत और साधना” (पृष्ठ 70-71)

ब्लॉग सारांश एवं विस्तार: KaalTatva.in टीम

सहायक संदर्भ:

श्रीमद्भागवत (दशम स्कन्ध – रासलीला एवं द्वारका लीला)

महाभारत (अनुशासन पर्व – सौभरि ऋषि कथा)

पातंजल योगसूत्र (विभूतिपाद – कायव्यूह)

ब्रह्मसूत्र भाष्य (शंकराचार्य – 4.4.15)

भामती (वाचस्पति मिश्र – 4.1.11)

न्यायकुसुमांजलि (उदयनाचार्य)

प्रत्यक्षज्ञादर्शन (अभिनवगुप्त)

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