मौत के पार? विज्ञान क्या कहता है

nilesh
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 नियर-डेथ एक्सपीरियंस, मृत्यु के पार की चेतना का वैज्ञानिक सत्य

जब हृदय रुक जाता है, जब मस्तिष्क में ऑक्सीजन का प्रवाह बंद हो जाता है, तब क्या चेतना भी समाप्त हो जाती है? या फिर कुछ ऐसा घटित होता है जिसे विज्ञान अभी पूरी तरह समझ नहीं पाया है?


Near-Death Experience
                              Near-Death Experience


नियर-डेथ एक्सपीरियंस (NDE) – यानी ‘मृत्यु के निकट का अनुभव’ – उन लाखों लोगों की कहानी है, जो क्लिनिकल डेथ (नैदानिक मृत्यु) के बाद वापस जीवन में लौटे, और उन्होंने मृत्यु के उस क्षण में एक अद्भुत, गहन और जीवन-परिवर्तक अनुभव का वर्णन किया।


डॉ. पिम वान लोम्मेल, नीदरलैंड्स के हृदय रोग विशेषज्ञ, ने इस विषय पर 1988 से 1992 तक दस डच अस्पतालों में 344 कार्डियक अरेस्ट (हृदयाघात) के मरीजों पर एक अग्रगामी अध्ययन किया। उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले थे ।


 क्या कहता है विज्ञान? (वैन लोम्मेल अध्ययन)

डॉ. पिम वान लोम्मेल का अध्ययन द लैंसेट (2001) में प्रकाशित हुआ था । उनके मुख्य निष्कर्ष:

कार्डियक अरेस्ट से बचे 344 मरीजों में से 62 (18%) ने NDE का अनुभव किया ।

इनमें से 41 (12%) ने ‘कोर एक्सपीरियंस’ (गहन NDE) का वर्णन किया ।

यह अनुभव कार्डियक अरेस्ट की अवधि, ऑक्सीजन की कमी, दवाओं, या मृत्यु के भय से संबंधित नहीं था ।


NDE के दौरान मरीजों ने जिन चीजों का वर्णन किया, वे अद्भुत हैं:

शरीर से बाहर निकलना (Out-of-Body Experience)

एक सुरंग के माध्यम से प्रकाश की ओर बढ़ना

एक अद्भुत, प्रेममय प्रकाश से मिलन

अपने पूरे जीवन का एक फिल्म की तरह पुनर्दर्शन

मृत प्रियजनों से मिलन

अकथनीय शांति और आनंद की अनुभूति


NDE को केवल ‘मस्तिष्क का भ्रम’ नहीं कहा जा सकता

डॉ. वान लोम्मेल के अनुसार, “NDE एक प्रामाणिक अनुभव है जिसे केवल कल्पना, मृत्यु के भय, मतिभ्रम, मनोविकार, दवाओं के उपयोग, या ऑक्सीजन की कमी तक सीमित नहीं किया जा सकता” ।

वैज्ञानिकों के लिए यह एक चुनौती है: जब मस्तिष्क ‘फ्लैट’ (कोई गतिविधि नहीं) होता है, तब स्पष्ट और संवर्धित चेतना – यादों, आत्म-पहचान, अनुभूति और भावनाओं के साथ – कैसे संभव हो सकती है?

NDE के दौरान मरीजों ने ऐसी चीजें देखीं और सुनीं, जिनकी पुष्टि बाद में चिकित्सकीय रिकॉर्ड और घटनाओं से होती है। उदाहरण के लिए, कई मरीजों ने ऑपरेशन थियेटर में रखे गए किसी विशिष्ट उपकरण या वस्तु को देखने का वर्णन किया – जबकि उनकी आंखें बंद थीं और वे क्लिनिकल डेथ की स्थिति में थे ।


क्या चेतना मस्तिष्क से परे है?

डॉ. वान लोम्मेल का तर्क है कि चेतना हमेशा मस्तिष्क के कार्य के साथ मेल नहीं खाती । उनके अनुसार:

“एन्हांस्ड या नॉनलोकल चेतना, अपरिवर्तित आत्म-पहचान के साथ, स्पष्ट रूप से बिना जीवन के शरीर से स्वतंत्र रूप से अनुभव की जा सकती है। लोग दृढ़ता से मानते हैं कि उन्होंने अपने NDE के दौरान जिस आत्म का अनुभव किया, वह एक वास्तविकता है, भ्रम नहीं” ।

यह रुद्रयामल उत्तरतन्त्र के ‘सूक्ष्म शरीर’ और ‘प्राण-वायु’ के सिद्धांत से पूरी तरह मेल खाता है – जहाँ कहा गया है कि मृत्यु के समय कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्णा मार्ग से सहस्रार की ओर बढ़ती है, और आत्मा शरीर से अलग होकर अपनी यात्रा शुरू करती है।


 NDE के दीर्घकालिक प्रभाव

वैन लोम्मेल के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 2 साल और 8 साल बाद किए गए अनुवर्ती साक्षात्कार थे ।


जिन मरीजों ने NDE का अनुभव किया था, उनमें:

मृत्यु का भय समाप्त हो गया था

पुनर्जन्म और जीवन के बाद के अस्तित्व में विश्वास बढ़ गया था

अधिक आध्यात्मिक और सामाजिक जागरूकता विकसित हुई थी

उनके जीवन के मूल्यों में गहरा परिवर्तन आया था (भौतिकवाद से आध्यात्मिकता की ओर)

यह परिवर्तन उन मरीजों में नहीं देखा गया, जो कार्डियक अरेस्ट से बचे तो गए, लेकिन उन्होंने NDE का अनुभव नहीं किया था ।


 NDE और प्राचीन भारतीय तन्त्र: एक समानता

NDE के दौरान मरीजों का ‘शरीर से बाहर निकलना’ और ‘ऊपर से अपने शरीर को देखना’ ठीक उसी प्रकार का है, जैसा रुद्रयामल उत्तरतन्त्र में ‘सूक्ष्म शरीर की यात्रा’ का वर्णन है।

NDE का ‘सुरंग के माध्यम से प्रकाश की ओर जाना’ – यह सुषुम्णा मार्ग है, जिसमें कुण्डलिनी मूलाधार से सहस्रार तक यात्रा करती है।


NDE का ‘जीवन का पुनर्दर्शन’  यह ‘कर्म’ का सिद्धांत है। मरीज अपने हर कर्म का प्रभाव – अच्छा या बुरा – दूसरों पर कैसे पड़ा, इसे देखते हैं। यही कर्म का लेखा-जोखा है।


चेतना पर नया दृष्टिकोण

2025 के एक नए अध्ययन (एंजेली-फेज़ एट अल.) के अनुसार, NDE उस समय घटित होता है जब मस्तिष्क गंभीर रूप से संकट में होता है – जब कॉर्टिकल इलेक्ट्रिकल गतिविधि अनुपस्थित या गंभीर रूप से अव्यवस्थित होती है ।

यह तर्क दिया गया है कि इस घटना को ‘चेतना का मस्तिष्क से परे अस्तित्व’ के रूप में समझा जा सकता है ।

विज्ञान आज उस द्वार पर खड़ा है, जहाँ तन्त्र हजारों वर्ष पहले पहुँच चुका था। डॉ. पिम वान लोम्मेल का कहना है:

“हमारे पास यह मानने के अच्छे कारण हैं कि हमारी चेतना, आत्म के निरंतर अनुभव के साथ, हमेशा हमारे मस्तिष्क के कार्य के साथ मेल नहीं खाती। एन्हांस्ड या नॉनलोकल चेतना, अपरिवर्तित आत्म-पहचान के साथ, स्पष्ट रूप से बिना जीवन के शरीर से स्वतंत्र रूप से अनुभव की जा सकती है” ।


मृत्यु अंत नहीं है। यह केवल एक द्वार है।


स्रोत 

वैन लोम्मेल अध्ययन – द लैंसेट, 2001

NDE पर समीक्षा – Annals of the New York Academy of Sciences, 2011

2025 NDE समीक्षा – International Review of Psychiatry, 2025

NDE स्थानों की संरचना – bioRxiv, 2025

यूवीए डिवीजन ऑफ पर्सेप्चुअल स्टडीज – Medicine in Motion News, 2025

रुद्रयामल उत्तरतन्त्र – डॉ. रमाशंकर मिश्र (PDF)


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