अधिकमास – पुरुषोत्तम मास: समय के गणित से लेकर 'पुरुषोत्तम' की भक्ति तक

nilesh
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सोमवार, 17 मई 2026 – इस दिन से एक ऐसे महीने की शुरुआत होगी, जो न तो पूरी तरह सूर्य का है, न पूरी तरह चंद्र का। यह महीना 'अधिक' है – यानी अतिरिक्त। यह पुरुषोत्तम मास है।


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लेकिन सोचिए…


पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के इस खेल में 'अतिरिक्त' महीना कैसे आ जाता है? जब हमारे पास आधुनिक टेलीस्कोप और कंप्यूटर नहीं थे, तब हमारे ऋषि कैसे जान गए थे कि हर 32-33 महीने में एक महीना बढ़ जाता है? और जिस महीने का कोई देवता नहीं है, उसे भगवान विष्णु ने अपना महीना क्यों बना लिया?


KaalTatva.in आज आपको ले जाएगा 'अधिकमास' की उस गहन यात्रा पर, जहाँ खगोलशास्त्र, गणित, धर्मशास्त्र और भक्ति – सब एक सूत्र में बंध जाते हैं। यह केवल एक महीना नहीं है – यह समय (काल) को समझने और नियंत्रित करने की हमारी सनातन परंपरा का अद्भुत उदाहरण है।


 अधिकमास क्या है? – जब चंद्रमा सूर्य से 'आगे निकल जाता है'

भारतीय पंचांग ल्यूनी-सोलर (चंद्र-सौर) है। यानी हमारा वर्ष चंद्र के मासों पर भी चलता है और सूर्य की संक्रांतियों पर भी।


सरल भाषा में समझिए:

पृथ्वी सूर्य का एक पूरा चक्कर लगाती है – इसे सौर वर्ष कहते हैं। इसमें लगभग 365 दिन होते हैं।

वहीं, चंद्रमा पृथ्वी के 12 चक्कर लगाता है – इसे चंद्र वर्ष कहते हैं। इसमें लगभग 354 दिन होते हैं।

अंतर: 365 – 354 = 11 दिन। हर साल यह अंतर बढ़ता जाता है।


पहले साल: 11 दिन का अंतर

दूसरे साल: 22 दिन का अंतर

तीसरे साल: 33 दिन का अंतर


और 33 दिन लगभग एक चंद्र मास (29.5 दिन) के बराबर होते हैं। यही अतिरिक्त महीना है – 'अधिकमास'।


हर तीसरे साल (लगभग 32-33 महीने बाद) यह एक महीना आसमान में 'अतिरिक्त' आ जाता है। सूर्य और चंद्रमा का हिसाब बिठाने के लिए – ताकि हमारे त्योहार, ऋतुएँ और व्रत सही समय पर आते रहें।


जैसा कि ज्योतिषाचार्य परंतपकुमार जैमिनीकुमार व्यास ने स्पष्ट किया है:


"भारतीय पंचांग चांद्रसौर (Luni-Solar) है। अत: यथाकाल अधिकमास उमेराने से महीनों और ऋतुओं का मेल जलवाया जाता है।"


 खगोलशास्त्र – जब एक ही राशि में आती है दो अमावस्या

अब सवाल उठता है – किस महीने को 'अधिक' कहा जाए?


नियम सरल है: प्रत्येक चंद्र मास का नाम उस सूर्य राशि पर रखा जाता है, जिसमें उस मास की अमावस्या के समय सूर्य होता है।


अगर अमावस्या के समय सूर्य मेष राशि में है → मास का नाम वैशाख।


अगर वृषभ में है → ज्येष्ठ।

अगर मिथुन में है → आषाढ़... और इसी तरह।


परंतु कभी-कभी ऐसा होता है – एक अमावस्या के समय सूर्य वृषभ राशि में है, और अगली अमावस्या के समय भी सूर्य उसी वृषभ राशि में है। इसका मतलब हुआ – उस अंतराल में कोई सूर्य संक्रांति नहीं हुई।


इस बिना संक्रांति वाले चंद्र मास को 'अधिकमास' कहते हैं। यानी 'अतिरिक्त महीना'।


2026 का अधिकमास:

17 मई से 15 जून 2026 तक यह अधिकमास रहेगा। इसका नाम है – अधिक ज्येष्ठ। क्योंकि इससे पहले और इसके बाद – दोनों तरफ 'ज्येष्ठ' ही आ रहे हैं।


H2: पंचांग का अद्भुत समन्वय – जब धर्म और विज्ञान मिलते हैं

हमारे ऋषियों ने सिर्फ यह नहीं गणना किया कि अधिकमास कब आता है। उन्होंने यह भी तय किया – इस अतिरिक्त महीने में क्या करना चाहिए और क्या नहीं।


 अधिकमास में वर्जित कर्म

क्योंकि इस महीने में कोई सूर्य संक्रांति नहीं होती, इसलिए इसका कोई 'संक्रांति देवता' भी नहीं है। प्रत्येक मास का एक देवता होता है – लेकिन अधिकमास का कोई नहीं।


इसीलिए इस महीने में:

विवाह (लग्न) नहीं किए जाते

यज्ञोपवीत (जनेऊ) के संस्कार नहीं किए जाते

गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते

नए व्यापार या शुभ आरंभ नहीं किए जाते


क्योंकि जिस महीने का कोई अधिष्ठाता (देवता) न हो, वहाँ मांगलिक कर्म करना शास्त्रों ने उचित नहीं माना।


 अधिकमास में विहित कर्म – 'पुरुषोत्तम' का वरदान

पुराणों के अनुसार, जब किसी महीने का देवता नहीं था, तब भगवान विष्णु ने स्वयं इस महीने को अपना महीना बना लिया। इसीलिए इसका नाम 'पुरुषोत्तम मास' पड़ा – भगवान विष्णु का महीना।


इस महीने में:


निष्काम भाव से विष्णु पूजन करना चाहिए

दही, घी, वस्त्र, धान्य का दान करना चाहिए – यह अत्यंत पुण्यकारी माना गया है


विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए

श्रीमद्भागवत पुराण का पारायण करना चाहिए

विष्णु याग और सत्य पूजन करना चाहिए


एक अर्थ में, यह महीना सांसारिक मांगलिक कार्यों (लग्न, व्यवसाय) के लिए नहीं है – बल्कि आध्यात्मिक साधना, दान और भक्ति के लिए है।


 काल का नियमन – ऋषियों की अद्भुत देन

परंतपकुमार व्यास ने ठीक ही लिखा है:

"आधुनिक टेलिस्कोप, कंप्यूटर आदि न होने के बावजूद, भारतीय सनातन वैदिक परंपरा के ऋषियों ने न केवल पृथ्वी और चंद्रमा की अनियमित गति को समझा, बल्कि अधिकमास, क्षयमास आदि से काल का नियमन भी किया।"


यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।


बिना किसी आधुनिक यंत्र के, केवल सूक्ष्म अवलोकन, गणितीय सूत्र और साधना के बल पर – हमारे ऋषियों ने यह जान लिया था कि चंद्रमा और पृथ्वी की गतियाँ एक दूसरे से मेल नहीं खातीं। उन्होंने अधिकमास और क्षयमास की जटिल गणना की।


उन्होंने यह भी तय किया कि 32 महीने (लगभग 2 साल 8 महीने) में एक बार यह अधिकमास आता है। और क्षयमास तब आता है, जब एक ही मास में दो सूर्य संक्रांतियाँ आ जाएँ – जो अत्यंत दुर्लभ है।


यही 'काल का विज्ञान' है – जिसे पश्चिमी दुनिया 'क्रोनोलॉजी' और 'एस्ट्रोनॉमी' कहती है, वही हमारे यहाँ 'ज्योतिष' और 'पंचांग' है।


 मुस्लिम और हिंदू पंचांग – मूलभूत अंतर


मुस्लिम वर्ष केवल चांद्र (Lunar) है – यानी उसमें अधिकमास नहीं जोड़ा जाता। इसलिए रमजान जैसे महीने कभी गर्मी में आते हैं, कभी सर्दी में, कभी बरसात में। ऋतुओं के साथ उनका कोई स्थायी संबंध नहीं।


भारतीय वर्ष चांद्र-सौर (Luni-Solar) है – अधिकमास जोड़कर हम यह सुनिश्चित करते हैं कि:

अखा तीज (वैशाख सुद तीज) – वसंत के अंत में आती है

चातुर्मास – बरसात के मौसम में शुरू होता है

दिवाली – शरद ऋतु के अंत में

होली – वसंत के आरंभ में


हमारे ऋषियों ने यह क्यों किया? क्योंकि उनके अनुसार:


"कालानुपूर्वविहिताश्च यज्ञाः" – जो यज्ञ और अनुष्ठान सही समय (ऋतु-अनुसार) पर किए जाते हैं, वे उत्तम फल देते हैं।

यही 'काल' का विज्ञान है – समय के साथ तालमेल बिठाना, उसके खिलाफ नहीं जाना।

  क्षयमास – जब एक मास में आए दो सूर्य संक्रांति

बहुत कम लोग जानते हैं कि अधिकमास का एक 'उल्टा' रूप भी होता है – क्षयमास।

जब एक ही चंद्र मास में दो सूर्य संक्रांतियाँ आ जाएँ, तो उसे क्षयमास कहते हैं। यह अत्यंत दुर्लभ घटना है।


विशेष रूप से, जब क्षयमास आता है, तो:

क्षयमास के पहले तीन महीनों में एक अधिकमास

क्षयमास के बाद के तीन महीनों में दूसरा अधिकमास

– ऐसे दो अधिकमास एक ही वर्ष में आ जाते हैं।


शास्त्रों में इन तीनों (क्षयमास, पहले का अधिकमास, बाद का अधिकमास) के अलग-अलग नाम हैं:


संसर्प – क्षयमास से पहले का अधिकमास

मिलित्युग – क्षयमास के बाद का अधिकमास


अहस्पति – क्षयमास स्वयं

यह गणना इतनी सूक्ष्म और जटिल है कि इसे समझना ही एक बड़ा अध्ययन है। और यह सब हमारे ऋषियों ने बिना कंप्यूटर के कर दिखाया।


पुरुषोत्तम मास का आध्यात्मिक रहस्य

जब किसी महीने का कोई देवता नहीं होता, तो हमारे शास्त्र उसे 'खाली' नहीं छोड़ते। भगवान विष्णु ने इस महीने को अपना महीना बना लिया – इसलिए इसे 'पुरुषोत्तम मास' कहा जाता है।


'पुरुषोत्तम' का अर्थ है – सभी पुरुषों में उत्तम। यह भगवान विष्णु का ही नाम है।


इस महीने की भक्ति का रहस्य क्या है?


साधारण महीनों में हम सकाम भाव से पूजा करते हैं – हम कुछ माँगने के लिए जाते हैं। लेकिन पुरुषोत्तम मास की पूजा निष्काम है – बिना कुछ माँगे।


जब आप बिना कुछ माँगे पूजा करते हैं, तब आप भक्ति के मूल सत्य पर पहुँचते हैं। तब आप 'व्यापारी' नहीं, 'पुत्र' बन जाते हैं। यही इस महीने की साधना है।


जैसा कि पुराणों में कहा गया है:


"जो इस महीने में दही, घी, वस्त्र और धान्य का दान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।"


 वैज्ञानिक दृष्टिकोण – आधुनिक खगोलशास्त्र क्या कहता है?

अधिकमास केवल धार्मिक मान्यता नहीं है – यह शुद्ध खगोलशास्त्र है।


प्राचीन संस्कृत नाम आधुनिक वैज्ञानिक अर्थ

अधिकमास 'इंटरकैलेरी मंथ' – एक अतिरिक्त महीना जो चंद्र और सौर कैलेंडर को संतुलित करने के लिए जोड़ा जाता है

क्षयमास एक महीना जिसमें 'बिना संक्रांति' के कारण दो संक्रांतियाँ आ जाती हैं – अत्यंत दुर्लभ

32-33 मास का चक्र लगभग 2.7 वर्ष का अंतराल, ठीक वैसे ही जैसे पश्चिमी 'ग्रेगोरियन कैलेंडर' में 'लीप ईयर' का अंतराल है

लीप ईयर में एक दिन अतिरिक्त जोड़ा जाता है – हमारे ऋषियों ने पूरे एक महीने का 'लीप' तंत्र बना दिया था। यह कहीं अधिक सटीक और गहन गणना है।


इससे भी आगे...


वैदिक ऋषियों ने न केवल पृथ्वी-सूर्य-चंद्र की गति समझी, बल्कि ग्रहों की स्थिति, उनके प्रभाव, और उसका जीवन पर प्रभाव – सबको एक सूत्र में पिरो दिया। यही 'काल' का व्यापक विज्ञान है – जिसमें आसमान और ज़मीन, खगोल और जीवन, दोनों एक साथ हैं।


 अधिकमास की भ्रांतियाँ

 अधिकमास अशुभ होता है, इसलिए इसमें कुछ भी नहीं करना चाहिए।


  अधिकमास मांगलिक कर्मों (जैसे – विवाह, यज्ञोपवीत) के लिए नहीं है, लेकिन यह दान, ध्यान, पूजा और अध्ययन के लिए सबसे उत्तम समय है। 'अशुभ' का अर्थ 'बुरा' नहीं, बल्कि 'सांसारिक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं' है।

 

अधिकमास का कोई महत्व नहीं है, यह सिर्फ हिसाब मिलाने का गणित है।


 यह सिर्फ गणित नहीं है। यह समय के प्रति सम्मान है। यह दिखाता है कि हमारी संस्कृति ने 'काल' को कितना गहरा समझा – उसे न तो अनदेखा किया, न पूजा से अलग रखा।


  विज्ञान और धर्म अलग-अलग हैं। अधिकमास धार्मिक मान्यता है, इसका खगोल से कोई संबंध नहीं।


 अधिकमास का खगोल-गणित आज भी उतना ही सटीक है जितना 2000 वर्ष पहले था। यह विज्ञान और धर्म का अद्भुत संगम है – जहाँ खगोल ने धर्म को आधार दिया, और धर्म ने खगोल को व्यावहारिक रूप।


  'काल' को समझने का सनातन तरीका

अधिकमास और पुरुषोत्तम मास की यह यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण सत्य सिखाती है:


समय (काल) कोई बाहरी शक्ति नहीं है – यह हमारे जीवन का अभिन्न अंग है।


हमारे ऋषियों ने 'काल' को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की – उन्होंने उसके साथ चलना सीखा। उन्होंने पहचाना कि सूर्य और चंद्रमा एक ताल में नहीं चलते। और इस असंतुलन को समायोजित करने के लिए उन्होंने अधिकमास का सुंदर और सटीक तंत्र बनाया।


हर तीसरे साल जब यह महीना आता है, तो यह हमें याद दिलाता है:


हम सब चंद्रमा की तरह हैं – अपनी गति में अनियमित, परंतु एक उच्च व्यवस्था में बंधे। और उस व्यवस्था का नाम है – 'काल'।


इस अधिकमास में, कुछ माँगने के लिए न जाएँ। थोड़ा रुकें। थोड़ा ठहरें। भगवान विष्णु को सिर्फ 'माँ' कहें। दही, घी, वस्त्र, धान्य का दान करें। भागवत पढ़ें।


क्योंकि जब आप बिना माँगे देना सीख जाते हैं – तब आप 'काल' के चक्र से बाहर निकलने लगते हैं।


 अब आपकी बारी

क्या आपने कभी अधिकमास के नियमों का पालन किया है? क्या आपने इस महीने में दान किया है या विष्णु पूजन किया है?


क्या आप मानते हैं कि प्राचीन भारतीय पंचांग आधुनिक कैलेंडर से अधिक वैज्ञानिक और सटीक था?


नीचे कमेंट में अपनी राय और अनुभव ज़रूर साझा करें।


 इस लेख को उन सबको शेयर करें जो ज्योतिष, कालगणना, और भारतीय पंचांग की गहराई में रुचि रखते हैं।




  सूचना (चेतावनी):

यह लेख केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ अधिकमास और पुरुषोत्तम मास से जुड़े धार्मिक विधानों का उल्लेख किया गया है। बिना गुरु या शास्त्रीय मार्गदर्शन के किसी भी व्रत, दान या अनुष्ठान को करने से पहले किसी योग्य ज्योतिषी या पुरोहित से परामर्श कर लें। यह लेख किसी को किसी विशेष पद्धति के लिए प्रोत्साहित नहीं करता।


प्रेरणा स्रोत: 

परंतपकुमार जैमिनीकुमार व्यास (ज्योतिषाचार्य, बी.कॉम.) द्वारा लिखित और व्याख्यायित 'अधिकमास – पुरुषोत्तम मास' विषयक अध्ययन सामग्री; वेदांग ज्योतिष, सूर्य सिद्धांत, आर्यभटीय, सिद्धांत शिरोमणि; तथा पुराणों में वर्णित पुरुषोत्तम मास माहात्म्य।

Mob: +91 9879611928

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