48 हज़ार विद्याएँ, अद्भुत यंत्र और सिद्धों की अलौकिक शक्तियाँ – जानें जैन तंत्र का वह रहस्य, जो आज भी अप्राप्य है!
क्या आप जानते हैं कि जैन धर्म केवल अहिंसा और त्याग का मार्ग नहीं है? क्या आपको पता है कि जैन आचार्यों ने तंत्र, मंत्र, यंत्र और विद्याओं का एक विशाल साहित्य रचा था? आज हम बात करेंगे जैन तंत्र की उस गौरवशाली परंपरा की, जिसे इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया – पर जो आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी हजारों साल पहले थी।
विद्याधर – विद्याओं के धारक, देवतुल्य पुरुष
'विद्याधर' शब्द सुनते ही आपके मन में क्या आता है? क्या आप सोचते हैं कि यह सिर्फ कोई पौराणिक कथा है? तंत्र विद्या पुस्तक स्पष्ट बताती है कि जैनों के समवायांग ग्रंथ से ज्ञात होता है कि जैन आचार्यों के चार कुलों में एक विद्याधर कुल था। विद्याओं के धारक विद्याधर कहलाते थे।
ये विद्याधर सामान्य मनुष्य नहीं थे – ये विद्याओं के स्वामी थे। और कितनी विद्याएँ? यह पुस्तक बताती है कि नागराज ने गंधर्व और पन्नगों को 48 हज़ार विद्याएँ दी थीं!
सोचिए… 48 हज़ार विद्याएँ! यानी ज्ञान का इतना विशाल भंडार कि आज का कोई भी विश्वविद्यालय उसके सामने तुच्छ है। ये विद्याएँ क्या थीं? इनमें लक्ष्मी विद्या, स्त्री-देवता अधिष्ठित विद्याएँ, पुरुष-देवता अधिष्ठित मंत्र – सब कुछ सम्मिलित था।
"स्त्री देवताधिष्ठित विद्या जपादि साध्य तथा पुरुष देवताधिष्ठित मंत्र-पाठ साध्य माने गए हैं।"
यानी, कुछ विद्याएँ जप से सिद्ध होती थीं और कुछ मंत्र पाठ से – यह पूरा एक वैज्ञानिक प्रणाली थी!
जैन तंत्र का स्वर्णिम इतिहास – 2000 वर्षों की अविच्छिन्न परंपरा
तंत्र विद्या ने जैन तंत्र के इतिहास को अद्भुत रूप से दस्तावेजित किया है। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों में फैली हुई है। समस्त-मद्र द्वारा रचित स्वयंभू स्तोत्र दूसरी शताब्दी ईस्वी की रचना है। तीसरी शताब्दी में मानदेव ने शांतिस्तव लिखा। चौथी शताब्दी में सिद्धसेन ने महावीर स्तुति की रचना की। पाँचवीं शताब्दी में पूज्यपाद ने शांत्यष्टक लिखा।
छठी शताब्दी में द्वितीय मंत्रवादी ने उवसग्गहर स्तोत्र की रचना की। सातवीं शताब्दी में मानतुंग ने भक्तामर स्तोत्र लिखा, जो आज भी जैन मंदिरों में गाया जाता है। उसी समय बप्पजय ने विषापहर स्तोत्र लिखा। नवीं शताब्दी में नंदिषेण ने अजित शांतिस्तव की रचना की।
लेकिन असली रहस्य यहाँ है… दसवीं शताब्दी में इंद्रनंदी ने ज्वालामालिनी कल्प लिखा, सिंहतिलक सूरि ने मंत्रराज रहस्य और तंत्र लीलावती की रचना की। ग्यारहवीं शताब्दी में मल्लिषेण ने ऋषिमंडल स्तोत्र लिखा और वादिराज प्रथम ने एकीभाव स्तोत्र की रचना की। बारहवीं शताब्दी में मल्लिषेण सूरी ने भैरव पद्मावती कल्प लिखा, मुनि सुकुमार सेन ने विद्यानुशासन की रचना की, धर्मघोष सूरि ने चिन्तामणि कल्प और सागर चंद्र सूरि ने मंत्राधिराज कल्प की रचना की।
ये सभी ग्रंथ चमत्कारी मंत्रपूर्ण स्तोत्र हैं। ये उत्तम भक्ति काव्य होते हुए भी मंत्र शक्ति से परिपूर्ण हैं। ये ग्रंथ अद्भुत और महत्वपूर्ण हैं। इनमें नवकार मंत्र कल्प, लोगस्स कल्प, अरहंतुणं कल्प, ह्रींकार कल्प, विजय पहुत कल्प, बुद्धिमान कल्प, सिद्धशांति कल्प, चंद्र प्रज्ञप्ति विद्या कल्प, विद्यानुशासन और रहस्य कल्पद्रुम जैसी अनेक रचनाएँ सम्मिलित हैं। तंत्र-साहित्य में इनका महत्वपूर्ण योगदान है।
देवियाँ और उपासना – जब जैनों ने शक्ति को अपनाया
जैसे बौद्धों में तारा और वैदिकों में काली, दुर्गा, चण्डी का महत्वपूर्ण स्थान है, उसी तरह जैनों में पद्मावती, चक्रेश्वरी और अंबिका का विशेष स्थान है। ये जैनों की विशिष्ट प्रभाववाली देवियाँ मानी गई हैं।
चौथी और पाँचवीं शताब्दी से सरस्वती स्तोत्रों की रचनाएँ मिलती हैं, और दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी से चक्रेश्वरी, अंबिका, पद्मावती आदि के स्तोत्र रचे जाने लगे।
सोचिए… जब हम जैन धर्म को केवल अहिंसा और त्याग तक सीमित कर देते हैं, तो हम इसके शाक्त पक्ष को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं। पर यह सत्य है कि जैनों ने भी शक्ति की उपासना को अपनाया – पर एक शुद्ध और संयमित रूप में।
इस पुस्तक के अनुसार, 850 ईसा पूर्व भगवान पार्श्वनाथ के समय मूलतः तीन परंपराएँ चल रही थीं – वैदिक, तापस और भौतिकवादी। तापस प्रायः मंत्र, यंत्र, तंत्र, पंचाग्नि तप, हठयोग आदि से जनता को अपनी ओर आकर्षित करते रहते थे। पार्श्वनाथ ने उस समय ध्यान-योग को अधिक महत्व दिया, जिसमें आत्म-कल्याण प्रमुख था। पर पूर्व संस्कारों के कारण धीरे-धीरे साधु-परंपरा में मंत्र-तंत्र को भी पूरा आश्रय प्राप्त हुआ और अनेक उपासनाएँ एवं क्रियाकांड प्रचलित हुए।
पंच नमस्कार की परंपरा तो पुरानी चली आ रही थी, पर समय-समय पर अन्य क्रियाएँ भी चालू हो गईं और नमस्कार मंत्र के आगे बीजाक्षर लगाकर रोग-उपद्रव आदि के लिए नमस्कार-मंत्र का उपयोग चमत्कारपूर्ण कामों में भी होने लगा। जैन संप्रदाय में वाम-मार्गियों की तरह शक्ति पूजा का आश्रय कभी नहीं लिया गया – इस तरह का मार्ग जैन परंपरा में किसी ने नहीं अपनाया।
यंत्र – ऊर्जा को केंद्रित करने का अद्भुत विज्ञान
जैन परंपरा में यंत्र का विशेष स्थान है। तंत्र विद्या बताती है कि आराध्य देवी की शक्ति का एक स्थान पर केन्द्रीकरण ही यंत्र कहलाता है। जैन संप्रदाय में यंत्रों की परंपरा खूब चली और उनके यंत्रों की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगे।
"देवेन्द्रगणि के 'कोष्ठकचितामणि' नामक ग्रंथ में बहुत समीचीन रूप से वर्धमान किया गया था, पर आज वह ग्रंथ मूल रूप से प्राप्त नहीं है, पर उसकी टीकाएँ मिल जाती हैं।"
जैन संप्रदाय में 15िया, 20िया, 34िया, 65िया आदि – त्रिकोण, षट्कोण, चतुरस्र, अर्धवृत्त, हस्ताकार, स्त्रीशस्त्रकृतिमूलक, पुष्पाकृति वाले अनेक यंत्रों की अति आश्चर्यजनक रचना हुई।
(क्या आपने कभी 15िया, 20िया, 34िया या 65िया जैसे शब्द सुने हैं?
ये कोई गुप्त भाषा नहीं हैं, न ही कोई जादुई मंत्र। ये हैं जैन तंत्र के अद्भुत यंत्रों के नाम – जिनमें अंकों का जादू छिपा है! आज हम इन्हीं यंत्रों के रहस्य को खोलेंगे।
मैजिक स्क्वायर – अंकों का वह खेल, जो ऊर्जा केंद्रित करता है
15िया, 20िया, 34िया, 65िया – ये सभी मैजिक स्क्वायर (Magic Square) पर आधारित यंत्र हैं। मैजिक स्क्वायर में संख्याओं को इस तरह गोलाकार या चौकोर आकार में लिखा जाता है कि ऊपर-नीचे, बाएँ-दाएँ और तिरछे किसी भी दिशा में जोड़ने पर एक ही संख्या आती है।
सोचिए… आज जब विज्ञान फ्रैक्टल्स और ज्यामितीय पैटर्न की बात करता है, तो हजारों साल पहले जैन आचार्य इस अंक-ज्यामिति का उपयोग दैवीय ऊर्जा को केंद्रित करने के लिए कर रहे थे!
15िया – तीन का जादू, 15 का रहस्य
15िया यानी 15 का यंत्र। यह 3x3 का ग्रिड होता है, जिसमें 1 से 9 तक के अंक इस तरह गोलाकार या चौकोर रूप में लिखे जाते हैं कि किसी भी दिशा से जोड़ने पर 15 आता है।
यह नवकार यंत्र से भी जुड़ा है – जहाँ 1 से 9 अंक नवकार मंत्र के 9 पदों को दर्शाते हैं। लेकिन असली रहस्य यहाँ है… इस यंत्र की 4 जातियाँ हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – जिनके अलग-अलग रंग, तत्व और प्रभाव हैं। यानी, एक ही यंत्र – पर चार अलग-अलग ऊर्जा धाराएँ!
65िया – 24 तीर्थंकरों का पवित्र यंत्र
65िया यानी 65 का यंत्र। यह 5x5 का ग्रिड है, जिसमें 1 से 25 तक के अंक इस तरह लिखे जाते हैं कि हर दिशा से जोड़ने पर 65 आता है।
निष्कर्ष – अंकों में छिपा ईश्वरीय संतुलन
15िया, 20िया, 34िया, 65िया – ये केवल संख्याएँ नहीं हैं। ये ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक हैं। जैसे प्रकृति में हर चीज़ संतुलित है – ग्रह, नक्षत्र, ऋतुएँ – वैसे ही ये यंत्र संख्या-संतुलन के द्वारा दैवीय ऊर्जा को आमंत्रित करते हैं।
"ये यंत्र आराध्य देवी की शक्ति का एक स्थान पर केन्द्रीकरण हैं – यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है।"
आज जब विज्ञान फ्रैक्टल्स, ज्यामिति और ऊर्जा केंद्रों की बात करता है, तो जैन आचार्यों का यह ज्ञान हमें याद दिलाता है कि हम अपनी जड़ों से कितना कुछ खो चुके हैं – और अब फिर से खोज रहे हैं! )
न्यूपि मंडल यंत्र, नमस्कार चक्र, विश्रय यंत्र, सर्वतोभद्र यंत्र, विजय पताका, अजुन पताका, रावण पताका, हस्ती यंत्र, अद्भुत यंत्र, शनि यंत्र – ये सभी प्रसिद्ध यंत्र हैं।
आज भी विहार में विजय राजयंत्र, विजय पताका, सर्वतोभद्र यंत्र का प्रचलन जगह-जगह मिल जाता है। सोचिए… जब आज विज्ञान यंत्रों (मशीनों) और ऊर्जा केंद्रों की बात करता है, तो हज़ारों साल पहले जैन आचार्य इन यंत्रों के द्वारा दैवीय ऊर्जा को केंद्रित कर रहे थे!
वनस्पति कल्प – जड़ी-बूटियों का वह विज्ञान, जो सब भूल गए!
जैन तंत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है – वनस्पति कल्प। इस पुस्तक में बताया गया है कि विद्यानुशासन में श्वेतवारा, श्वेतगुंजा, मयूरशिखा, सहदेवी, शंखपुष्पी आदि वृक्षों की जड़ों के द्वारा रोग-दोष निवारण, व्यापार वृद्धि, द्रव्यलाभ, इच्छित कार्य सिद्धि, सुख-प्रसन्नता, संतान प्राप्ति, काकबंध्या आदि दोष निवारण का विस्तार से विवेचन मिलता है।
यानी, जैन आचार्यों ने वनस्पति विज्ञान को तंत्र के साथ इतना गहरा जोड़ दिया कि एक जड़ी-बूटी ही रोग नाशक, आकर्षण, वशीकरण – सब कुछ कर सकती थी। यह कोई जादू नहीं, बल्कि प्रकृति की ऊर्जा को समझने का विज्ञान था।
अवतार प्रयोग – दर्पण, नख, दीप, जल, खड्ग – सब कुछ साधन
एक ओर हमें तंत्र-यंत्र-मंत्र की साधना मिलती है, तो दूसरी ओर कर्णपिठाचिनी, उच्छिष्ट चांडाली, ज्वाला मालिनी, अंबिका देवी के कल्प भी मिलते हैं – और मिलते हैं दर्पण, नख, दीप, जल, खड्ग, कुंडल आदि अवतार प्रयोग।
ये अवतार प्रयोग क्या थे? ये वे विधियाँ थीं जिनमें साधक दर्पण, नख, दीप जैसी साधारण वस्तुओं को ही ध्यान और मंत्र के द्वारा दिव्य उपकरण बना लेता था।
सोचिए… दर्पण में देवी का साक्षात्कार, दीपक की लौ में भविष्य देखना, जल में दूर की घटनाओं का दर्शन – यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि चेतना की उन्नत अवस्था का परिणाम था।
जैन तंत्र का पुनर्जागरण
तंत्र विद्या हमें दिखाती है कि जैन परंपरा तंत्र-विरोधी नहीं, बल्कि तंत्र-पूर्ण थी। यह सत्य है कि जैन आचार्यों ने वाम-मार्ग को नहीं अपनाया, पर उन्होंने शक्ति, यंत्र, मंत्र और विद्या को अपने धर्म में समाहित किया – एक शुद्ध, संयमित और आत्म-कल्याणकारी रूप में।
"जैन संप्रदाय में अनेक ग्रंथों की रचना हुई है, जो तंत्र-मंत्र साहित्य को अमूल्य निधि हैं।"
आज जब दुनिया माइंडफुलनेस, एनर्जी हीलिंग, साउंड थेरेपी की बात कर रही है, तब हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे पूर्वजों ने यह सब हजारों साल पहले ही कर लिया था – और वह भी पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति के साथ।
क्या आप जानते हैं कि जैन तंत्र की कौन-सी विद्या आज भी प्रचलित है? या आपने कभी कोई जैन यंत्र या कल्प देखा है? नीचे कमेंट में बताएँ!
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सूचना: यह लेख ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अध्ययन पर आधारित है। किसी भी साधना या अनुष्ठान को करने से पहले किसी योग्य गुरु से मार्गदर्शन अवश्य लें।
लेखक: KaalTatva.in टीम
प्रेरणा स्रोत: तंत्र विद्या (करणीदान सेठिया), जैन आगम, विद्यानुशासन, ज्वालामालिनी कल्प
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