प्राण और काल का रहस्य: तंत्रालोक के अनुसार समय का विज्ञान

nilesh
0

एक योगी अपनी गुफा में ध्यानस्थ है। उसकी साँसें धीमी हो चुकी हैं। वह अब केवल साँस नहीं ले रहा – वह साँस के भीतर बहने वाली 'प्राण' नामक ऊर्जा को महसूस कर रहा है।

उसके शरीर में दो धाराएँ बह रही हैं – एक ऊपर की ओर (प्राण), दूसरी नीचे की ओर (अपान)। ये दोनों विपरीत दिशाओं में दौड़ रही हैं। जब तक ये अलग-अलग दौड़ेंगी, तब तक वह समय (काल) के चक्र में बँधा रहेगा – जन्म और मृत्यु के बीच।

लेकिन जब वह इन दोनों को एक कर देता है – जब प्राण और अपान आपस में मिल जाते हैं – तो वह समय से परे हो जाता है। वह 'काल' को जीत लेता है।


tantraloka-pran-kal-rahasya


सोचिए…

क्या सच में हमारी साँसें समय को नियंत्रित करती हैं? क्या प्राण के भीतर छिपा है वह रहस्य जिसे जानकर ऋषि सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहते थे? और क्या 'काल' कोई बाहरी शक्ति है, या हमारे अपने शरीर के भीतर ही निवास करती है?


KaalTatva.in आज आपको ले जाएगा उस गहन यात्रा पर, जहाँ काश्मीर के महान दार्शनिक अभिनवगुप्त अपने महाग्रंथ 'तंत्रालोक' में इन सब प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं। जयरथ की विख्यात टीका 'विवेक' के साथ यह ग्रंथ प्राण, काल और चेतना के उस रहस्य को खोलता है, जिसे जानने के बाद आप अपने शरीर, अपनी साँस और समय को कभी उसी नज़र से नहीं देखोगे।


 तंत्रालोक क्या है? – काश्मीर शैववाद का वह ग्रंथ जिसे समझना आसान नहीं

'तंत्रालोक' (Tantrāloka) का अर्थ है – तंत्र पर प्रकाश। यह अभिनवगुप्त (अंदाजे 950-1050 ई.) द्वारा रचित काश्मीर शैववाद का सबसे विशाल और गहन ग्रंथ है। इसे 'अद्वैत तंत्र का विश्वकोश' भी कहा जाता है।


यह ग्रंथ 37 अध्यायों (आह्निकों) में विभाजित है। इसकी रचना का उद्देश्य अभिनवगुप्त ने स्वयं बताया है – उनके समय तक काश्मीर शैववाद की अनेक कीमती साधना-पद्धतियाँ बिखर चुकी थीं या पूरी तरह लुप्त हो गई थीं। अपने गुरु सोमशम्भु की आज्ञा से और अपने शिष्यों के आग्रह पर उन्होंने तंत्र के इस समग्र ज्ञान को एक व्यवस्थित और विस्तृत स्वरूप देने के लिए 'तंत्रालोक' की रचना की।


स्थानकल्पना – शरीर के भीतर का ब्रह्मांड

तंत्रालोक के सातवें अह्निक की शुरुआत अभिनवगुप्त इन शब्दों से करते हैं:

"स्थानप्रकल्पाख्यतया स्फुटस्तु बाह्योऽभ्युपायः प्रविविच्यतेऽथ" (श्लोक 1)


सरल अर्थ: अब 'स्थानकल्पना' नामक बाह्य उपाय का विस्तार से विवेचन किया जाता है।

'स्थानकल्पना' का अर्थ है – ध्यान और साधना के लिए स्थानों की रचना करना। यह स्थान दो प्रकार के होते हैं:

पहला – प्राण के भीतर का स्थान – शरीर के भीतर नाड़ियाँ, चक्र, बिंदु।

दूसरा – बाह्य स्थान – मंडल, यंत्र, प्रतिमा, पुस्तक, चित्र, आसन, आदि।

ग्रंथ में कहा गया है कि बाह्य स्थान (मंडल, यंत्र, मूर्ति) ग्यारह प्रकार के होते हैं – मंडल, स्थण्डिल, पात्र, अक्षसूत्र, समुस्तक, लिंग, तूर, पट, पुस्त, प्रतिमा, मूर्ति।


लेकिन असली रहस्य यहाँ है – ये सब बाह्य स्थान केवल प्रतीक हैं। इनकी साधना का वास्तविक लक्ष्य है – प्राण के भीतर स्थित उसी ऊर्जा को जागृत करना। जैसे बाहर मंडल बनाते हो, वैसे ही अपने शरीर के भीतर प्राण के मंडल को पहचानो।


प्राण, अपान और काल – शरीर के भीतर समय का चक्र

तंत्रालोक का सबसे गहन रहस्य यहाँ प्रकट होता है:

"संविन्मात्रं हि यच्छुद्धं प्रकाशपरमार्थकम्। (श्लोक 9)

तन्मेयमात्मनः प्रोद्य विविक्तं भासते नभः॥"


सरल अर्थ: शुद्ध चेतना (संविद्) ही सब कुछ है। वही प्रकाश का परम अर्थ है। वही अपने आप को 'मैं' और 'यह' (जगत्) के रूप में प्रकट करती है। जब हम इस चेतना को नहीं पहचानते, तो हमें सब कुछ 'बाहर' दिखता है – आकाश, तारे, पहाड़, नदियाँ।


लेकिन जब हम पहचान लेते हैं – तब यही बाहर का आकाश हमारे भीतर का 'शून्य' निकलता है।

अभिनवगुप्त आगे कहते हैं:

"तदेव शून्यरूपत्वं संविदः परिगीयते" (श्लोक 10)


अर्थ: चेतना के इसी शून्य रूप (सभी विकारों से रहित होने) को 'शून्यरूपत्व' कहते हैं। यह बौद्धों का शून्यवाद नहीं है – यह चेतना का वह शुद्ध रूप है, जहाँ कोई भाव (पदार्थ) नहीं है, लेकिन चेतना स्वयं है।


 नेति नेति – उस परम सत्य को कैसे जानें?

ग्रंथ में कहा गया है:


"नेति नेति विमर्शेन योगिनां सा परा दशा" (श्लोक 10)


अर्थ: 'नेति नेति' (यह नहीं, वह नहीं) के इसी विचार-विमर्श से योगी उस परम दशा को प्राप्त करते हैं। यह वही 'नेति नेति' है जिसका उल्लेख बृहदारण्यक उपनिषद में भी है – न वह यह है, न वह वह है। जब सभी 'भाव' (पदार्थ) और 'अभाव' (शून्यता) दोनों समाप्त हो जाते हैं, तब जो शेष रहता है, वही परम सत्य है।


यह वही 'मध्यमा प्रतिपद्' (मध्यम मार्ग) है, जिसे बुद्ध ने भी सिखाया था – न अस्ति (है), न नास्ति (नहीं है)। यही काश्मीर शैववाद का अद्वैत है।


 चेतना से प्राण तक की यात्रा

तंत्रालोक में प्राण और चेतना के संबंध को बड़े ही सुंदर ढंग से समझाया गया है:


"स एव खात्मा मेयेऽस्मिन् मेदिते स्वीक्रियोन्मुखः। (श्लोक 11)

पतन्नुच्छलत्त्वेन प्राणस्पन्दोर्मिसंज्ञितः॥"


सरल अर्थ: वही चेतना (शून्यप्रमाता) जब 'मैं' को स्वीकार करने के लिए बाहर की ओर मुख करती है, तो वह प्राण के रूप में प्रकट होती है। यह प्राण एक स्पंदन (कंपन) है – जैसे समुद्र में लहरें उठती हैं। इसी स्पंदन का नाम 'प्राण' है।


 संविद् (चेतना) प्राण में कैसे बदल जाती है?

जयरथ की टीका 'विवेक' में इसे और स्पष्ट किया गया है:

"तेनाहुः किल संवित्प्राक् प्राणे परिणता तथा" (श्लोक 12)


अर्थ: विद्वान कहते हैं कि चेतना (संविद्) पहले प्राण में परिणत (बदल) होती है। फिर यही प्राण अन्तःकरण (बुद्धि, मन, अहंकार) का आश्रय लेता है।


अर्थात्:


शुद्ध चेतना → प्राण → मन और बुद्धि → शरीर और जगत्

यही काश्मीर शैववाद का सृष्टि-क्रम है। जगत् कोई बाहरी पदार्थ नहीं है – यह हमारी अपनी चेतना का ही एक सघन रूप है। पहले चेतना स्पंदित होती है (प्राण), फिर वही स्पंदन मन और बुद्धि बनता है, और फिर वही मन और बुद्धि इस भौतिक शरीर और जगत् का निर्माण करते हैं।


"सा प्राणद्यन्तिः प्राणाद्यै रूपैः पञ्चभिरात्मसात्। (श्लोक 14)

देहं यत्कुरुते संवित्पूर्णस्तेनैष भासते॥"


अर्थ: यही प्राण वृत्ति (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान – पाँच रूपों में) देह (शरीर) को व्याप्त करती है। इसी से यह शरीर चैतन्य प्रतीत होता है। मूर्ख लोग सोचते हैं कि यह शरीर ही आत्मा है – लेकिन वास्तव में यह शरीर तो चेतना के प्राण-रूप का एक उपकरण मात्र है।


 प्राण की पाँच वृत्तियाँ और उनकी स्थिति

तंत्रालोक में पाँच प्राणों का वर्णन मिलता है:


प्राण स्थान दिशा कार्य

प्राण हृदय से गला तक ऊपर की ओर श्वास लेना, हृदय और फेफड़े

अपान नाभि से नीचे नीचे की ओर मल-मूत्र त्याग, शुक्र नियंत्रण

व्यान सर्वव्यापी सब दिशाओं में रक्त संचार, स्पंदन

उदान गला से मस्तक तक ऊपर की ओर उच्छ्वास, मृत्यु के समय आत्मा का निकलना

समान नाभि और हृदय के बीच केन्द्र की ओर पाचन और पोषण

अभिनवगुप्त कहते हैं कि जब प्राण और अपान आपस में मिल जाते हैं – जब ऊपर और नीचे की धाराएँ एक हो जाती हैं – तब सुषुम्ना नाड़ी जागृत होती है और योगी को काल पर विजय प्राप्त होती है।


 काल (समय) क्या है? – तंत्रालोक का अद्वैत दर्शन

तंत्रालोक के इन श्लोकों में 'काल' (समय) के स्वरूप पर बड़ा गहन विचार है:


"क्रमाक्रमात्मा कालश्च परः संविदि वर्तते। (श्लोक 7)

काली नाम परा शक्तिः सैव देवस्य गीयते॥"


अर्थ: 'क्रम' (क्रमबद्धता) और 'अक्रम' (अक्रमबद्धता) – यही दोनों मिलकर काल हैं। यह परम काल चेतना (संविद्) में ही विद्यमान है। वह 'काली' नाम की पराशक्ति है – यही देव (शिव) की शक्ति है।


गहन अर्थ: समय कोई बाहरी वस्तु नहीं है। घड़ी की सुईयाँ बाहर चलती हैं, लेकिन 'समय' का अनुभव हमारी चेतना में होता है। जब हम ध्यान में लीन होते हैं, तो समय रुक जाता है। जब हम दुःखी होते हैं, तो समय लंबा खिंच जाता है। जब हम आनंद में होते हैं, तो समय उड़ जाता है।


समय हमारी चेतना का ही एक खेल है।

ग्रंथ आगे कहता है:

"संविदेकैव पूर्णा स्या-द्वेद्यवेदकभाविनी"


अर्थ: चेतना (संविद्) ही एकमात्र पूर्ण सत्य है। वही 'वेद्य' (जानने योग्य – जगत्) और 'वेदक' (जानने वाला – आत्मा) दोनों के रूप में प्रकट होती है।


यही अद्वैत का सार है – दो नहीं, एक ही है। जगत् और आत्मा, दोनों उसी एक चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। जैसे सोना और सोने के बने गहने – गहने अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन सब सोना ही है।


 वैज्ञानिक दृष्टिकोण – तंत्रालोक और क्वांटम भौतिकी का संगम

तंत्रालोक के ये सिद्धांत आधुनिक भौतिकी के कुछ सबसे क्रांतिकारी विचारों से मेल खाते हैं।


'संविद्' (चेतना) और क्वांटम क्षेत्र (Quantum Field) – तंत्रालोक कहता है – शुद्ध चेतना ही सब कुछ है। पदार्थ उसी का एक सघन रूप है। क्वांटम भौतिकी कहती है – शून्य स्थान (Vacuum) खाली नहीं है। यह एक क्वांटम क्षेत्र है, जिससे सभी कण उत्पन्न होते हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं। दोनों एक ही बात कह रहे हैं – ब्रह्मांड का मूल कोई जड़ पदार्थ नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म ऊर्जा क्षेत्र है।


'नेति नेति' और पर्यवेक्षक का प्रभाव (Observer Effect) – तंत्रालोक के अनुसार, 'नेति नेति' के विचार से योगी सभी बाहरी पदार्थों को 'नहीं, यह नहीं' कहते हुए उस परम चेतना तक पहुँचते हैं। क्वांटम भौतिकी का डबल-स्लिट प्रयोग बताता है कि जब हम इलेक्ट्रॉन को 'देखते' (मापते) हैं, तो वह कण की तरह व्यवहार करता है। जब नहीं देखते, तो तरंग की तरह। पर्यवेक्षक की चेतना ही तय करती है कि वास्तविकता क्या होगी।


प्राण (Energy) और नाड़ियाँ (Energy Channels) – तंत्रालोक में 10 मुख्य नाड़ियों (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गांधारी, हस्तिजिह्वा, आदि) का वर्णन है। आधुनिक विज्ञान अब 'बायो-फोटॉन्स' (सजीव कोशिकाओं से निकलने वाला सूक्ष्म प्रकाश) और 'मेरिडियन' (एक्यूपंक्चर की ऊर्जा नलिकाएँ) पर शोध कर रहा है। तंत्रालोक का 'नाड़ी-विज्ञान' इसी का एक प्राचीन और विस्तृत रूप है।


दुनिया अब समझ रही है…


जिस 'चेतना की प्रधानता' (Primacy of Consciousness) को अभिनवगुप्त ने हजारों साल पहले प्रतिपादित किया था, वह आज चेतना के कठिन प्रश्न (Hard Problem of Consciousness) और पैनसाइकिज्म (Panpsychism – चेतना का सर्वव्यापित्व) जैसे आधुनिक दर्शन के केंद्र में है।


 तंत्रालोक का सातवाँ अह्निक – प्राण, काल और सृष्टि का संक्षिप्त सारांश

इस PDF (तंत्रालोक के सातवें अह्निक, श्लोक 1-30) का मूल सार यह है:

'स्थानकल्पना' – बाह्य (मंडल, यंत्र, मूर्ति) और आन्तरिक (प्राण, नाड़ी, चक्र) – दोनों ही साधना के स्थान हैं।

शुद्ध चेतना (संविद्) ही एकमात्र सत्य है। यही सृष्टि के समय 'प्राण' के रूप में प्रकट होती है।

प्राण की पाँच वृत्तियाँ – प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान – शरीर के सभी कार्यों को संचालित करती हैं।

'क्रम' और 'अक्रम' का सम्मिलन ही 'काल' (समय) है। यह काल चेतना की ही एक शक्ति (काली) है।

'नेति नेति' का विचार योगी को परम चेतना तक पहुँचाता है।

जब प्राण और अपान मिल जाते हैं, तो योगी 'काल' (समय) के चक्र से बाहर निकल जाता है और महासुख को प्राप्त करता है।


तंत्रालोक और काल के बारे में भ्रांतियाँ

 तंत्रालोक केवल तांत्रिक क्रियाओं (मारण, मोहन, वशीकरण) का ग्रंथ है।


 तंत्रालोक तांत्रिक दर्शन और साधना का सर्वोच्च ग्रंथ है। इसमें शक्ति-प्रयोग (जैसे पंचमकार) का वर्णन है, लेकिन यह केवल प्रतीकात्मक है और उच्चतम स्तर के साधकों के लिए है। ग्रंथ का 90% से अधिक भाग चेतना, प्राण, योग, काल, सृष्टि और अद्वैत के दार्शनिक विवेचन को समर्पित है।


  'काल' (समय) कोई बाहरी देवता है, जैसे यमराज।


  तंत्रालोक स्पष्ट कहता है – काल चेतना की ही एक शक्ति है। 'काल' शब्द का अर्थ यहाँ 'मृत्यु' नहीं है, बल्कि 'समय का क्रम' है। 'काली' शक्ति (शिव की शक्ति) ही समय के रूप में प्रकट होती है।


  'नेति नेति' केवल उपनिषदों का वाक्य है, तंत्र का इससे कोई संबंध नहीं।


 अभिनवगुप्त ने 'नेति नेति' को तंत्र-साधना के केंद्र में रखा है। उनके अनुसार, सभी बाहरी पदार्थों, विचारों और विकल्पों को 'यह नहीं, वह नहीं' कहकर त्याग देने से ही शुद्ध चेतना का साक्षात्कार होता है। यही 'निर्विकल्प समाधि' का मार्ग है।


 निष्कर्ष – 'प्राण' को जानो, 'काल' को जीतो

तंत्रालोक का यह अंश हमें एक महत्वपूर्ण सत्य सिखाता है:


'काल' (समय) कोई बाहरी शत्रु नहीं है। वह हमारी अपनी चेतना का, हमारे अपने 'प्राण' का एक खेल है।


जब हम प्राण को समझ लेते हैं – जब हम अपनी साँसों के भीतर बहने वाली उस सूक्ष्म ऊर्जा को पहचान लेते हैं – तो हम समय के चक्र से बाहर निकल जाते हैं। यही काश्मीर शैववाद का चरम लक्ष्य है – 'शिव' होना, यानी 'काल' से परे होना।


प्राण ही काल है। और प्राण पर नियंत्रण ही काल पर विजय है।


यही अभिनवगुप्त का संदेश है – अपने भीतर के 'प्राण' को पहचानो। उसी में छिपा है तुम्हारा अतीत, तुम्हारा वर्तमान, और तुम्हारा भविष्य। उसी में छिपा है तुम्हारा जन्म, तुम्हारी मृत्यु, और तुम्हारी मुक्ति।


 अब आपकी बारी

क्या आपने कभी अपनी साँसों के भीतर बहने वाली 'प्राण' ऊर्जा को महसूस किया है? क्या आपने कभी ध्यान में समय को 'रुका हुआ' अनुभव किया है?

क्या आप मानते हैं कि हमारी चेतना ही 'समय' का निर्माण करती है, न कि घड़ी की सुईयाँ?


  इस लेख को उन सबको शेयर करें जो तंत्र, योग, प्राणायाम और काश्मीर शैववाद के गहन दर्शन में रुचि रखते हैं।



  चेतावनी (Warning):

यह लेख केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ 'तंत्रालोक' के दार्शनिक सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाने का प्रयास किया गया है। 'प्राण' और 'नाड़ियों' से जुड़ी साधनाएँ अत्यंत सूक्ष्म और गूढ़ हैं। बिना योग्य गुरु के इन साधनाओं का अभ्यास करना शारीरिक और मानसिक हानि पहुँचा सकता है। कृपया पहले किसी योगाचार्य या तांत्रिक गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करें।


प्रेरणा स्रोत: 

अभिनवगुप्त कृत 'श्रीतन्त्रालोकः' (जयरथकृत विवेकाख्यटीकोपेतः), पण्डित मधुसूदन कौल शास्त्री द्वारा संपादित, काश्मीर सीरीज ऑफ टेक्स्ट्स एण्ड स्टडीज, खण्ड 4 (तृतीय आवृत्ति, 1922) – विशेषकर पटल 7 (सप्तमाह्निक), श्लोक 1-30।


 kaaltatva.in@gmail.com


Post a Comment

0 Comments

Post a Comment (0)
To Top