क्या ध्वनि केवल शब्द है या कुछ और?
सोचिए…
जब आप ‘ॐ’ का उच्चारण करते हैं, तो क्या सिर्फ हवा कंपित होती है?
या फिर कुछ और भी होता है – कुछ ऐसा जो आँखों से दिखता नहीं, पर महसूस जरूर होता है?
तन्त्रशास्त्र का उत्तर है – ध्वनि केवल शब्द नहीं है। ध्वनि चेतना की पहली अभिव्यक्ति है। वह अव्यक्त परमसत्ता ही है, जो क्रमशः अक्षर, मन्त्र और फिर सम्पूर्ण सृष्टि के रूप में प्रकट हुई।
इस यात्रा का नाम है – ‘नादब्रह्म’।
नादब्रह्म क्या है? – पूरा ब्रह्मांड ध्वनि से बना है
प्राचीन भारतीय आगमशास्त्रों के अनुसार, सृष्टि के आरम्भ में केवल एक अव्यक्त, अनाहत ध्वनि थी। वह न सुनाई देती थी, न उसे कोई सुन सकता था। वह थी – परनाद।
जैसे बीज में पूरा वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इस परनाद में सम्पूर्ण ब्रह्मांड, सभी देवता, सभी मन्त्र और सभी भाषाएँ अव्यक्त रूप से विद्यमान थीं।
आगम सिद्धान्त कहता है:
“नादरूपतया पूर्व शिवेनाविष्कृतः पुनः। सर्वांशवादिविष्टूपेण तेनेवासों पुनः कृतः।।”
अर्थात् – सबसे पहले नाद के रूप में शिव ने स्वयं को अभिव्यक्त किया। यही नाद आगे चलकर सभी प्रकार के मन्त्रों और तन्त्रों के रूप में प्रकट हुआ।
परनाद से वैखरी तक – अव्यक्त से व्यक्त की यात्रा (चार अवस्थाएँ)
तन्त्रशास्त्र ध्वनि की चार अवस्थाएँ बताता है:
परनाद (अव्यक्त, अनाहत ध्वनि – सृष्टि का मूल बीज)
पश्यन्ती (जहाँ ध्वनि ‘देखी’ जा सकती है, पर सुनी नहीं जा सकती)
मध्यमा (मन में स्पष्ट, पर मुख से बोली नहीं गई)
वैखरी (मुख से बोला गया शब्द – जिसे हम सुनते और बोलते हैं)
हम सामान्यतः केवल वैखरी को ही ‘भाषा’ समझते हैं। परन्तु वैखरी के पीछे एक सूक्ष्म जगत है, जिसे केवल गहन ध्यान और साधना से ही अनुभव किया जा सकता है।
आगम सिद्धान्त के अनुसार, परनाद की अभिव्यक्ति ही ‘स्फोट’ है, और वह स्फोट ही मूलवर्णभूत प्रणव (ॐ) है।
ॐ से लेकर अ, इ, उ से क्ष तक – वर्णों का रहस्य
प्रणव (ॐ) से सोलह स्वर और तैंतीस व्यंजन – कुल उनचास वर्ण अभिव्यक्त हुए। ये वर्ण केवल लेखन या उच्चारण के प्रतीक नहीं हैं। ये शक्ति के बिंदु हैं। ये चेतना के स्तर हैं।
ठीक उसी प्रकार जैसे आधुनिक भौतिकी बताती है कि पदार्थ केवल संघनित ऊर्जा है – उसी प्रकार वर्ण केवल अक्षर नहीं, संघनित ध्वनि-ऊर्जा (Sound Energy) हैं।
जब ये वर्ण एक निश्चित क्रम में संयोजित होते हैं, तो ‘पद’ बनते हैं। जब पद साधना-योग्य रूप में व्यवस्थित होते हैं, तो ‘मन्त्र’ बन जाते हैं। और मन्त्रों के सम्पूर्ण विज्ञान को ही ‘तन्त्र’ कहते हैं।
अर्थात् :
नाद → वर्ण → पद → मन्त्र → तन्त्र
यही वह अदृश्य सूत्र है जो ध्वनि को ईश्वर तक पहुँचाता है।
अथर्ववेद और नादब्रह्म – ‘असत्’ से ‘सत्’ तक
अथर्ववेद के स्तम्भसूक्त (10.7.21) में इसी नादब्रह्म सिद्धान्त की झलक मिलती है:
असत् शाखा – परमशाखा। यह अव्यक्त शक्ति है, ऊर्जा है। यह निराकार है।
सत् शाखा – अवर शाखा। यह व्यक्त मैटर है, जड़ पदार्थ है।
आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में:
असत् = Energy, सत् = Matter
विज्ञान अब यही कहता है। परन्तु अथर्ववेद ने यह बात हज़ारों वर्ष पहले कह दी थी – कि सम्पूर्ण सृष्टि असत् (शक्ति/ऊर्जा) से ही उत्पन्न हुई है।
श्रोत्र और आकाश – ‘दिव्य श्रोत्र’ का विज्ञान
योगदर्शन के विभूतिपाद में एक बहुत महत्वपूर्ण सूत्र है:
“श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमात् दिव्यश्रोत्रम्।”
अर्थात – जब साधक श्रोत्र (सुनने की इन्द्रिय) और आकाश के संबंध पर संयम साध लेता है, तो उसे ‘दिव्य श्रोत्र’ (अलौकिक श्रवण शक्ति) प्राप्त हो जाती है।
इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा कान केवल स्थूल ध्वनि नहीं सुन सकता। यदि सही साधना की जाए, तो यह सूक्ष्मतम अव्यक्त नाद – परनाद और पश्यन्ती – को भी ग्रहण कर सकता है।
प्राचीन ऋषियों ने ठीक इसी विधि से आगम-मन्त्रों को ग्रहण किया था। उन्होंने अपनी श्रोत्रेन्द्रिय को इतना सूक्ष्म और एकाग्र बना लिया था कि वे ब्रह्मांड की मूल ध्वनि को सुन सकते थे।
नादब्रह्म को लेकर भ्रम
“ध्वनि केवल कान से सुनी जा सकती है”
तथ्य: तन्त्रशास्त्र ध्वनि की चार अवस्थाएँ बताता है। वैखरी ही एकमात्र वह अवस्था है जो कान से सुनाई देती है। परनाद, पश्यन्ती और मध्यमा को केवल गहन साधना से ही अनुभव किया जा सकता है।
“मन्त्र केवल शब्दों का समूह है, उसके उच्चारण से कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता”
तथ्य: आधुनिक साइको-अकॉस्टिक्स (ध्वनि-मनोविज्ञान) भी मानता है कि विशिष्ट ध्वनि तरंगें मस्तिष्क के विशिष्ट भागों को प्रभावित करती हैं। तन्त्रशास्त्र तो यहाँ तक कहता है कि मन्त्र केवल मस्तिष्क ही नहीं, सम्पूर्ण प्राण ऊर्जा को पुनर्गठित कर सकते हैं।
“तन्त्र का ध्वनि-विज्ञान केवल अंधविश्वास है”
तथ्य: ‘नादब्रह्म’ से लेकर ‘वर्ण’ और ‘मन्त्र’ तक का यह सम्पूर्ण सिद्धान्त उतना ही सूक्ष्म और व्यवस्थित है, जितना आधुनिक भौतिकी का क्वांटम सिद्धान्त। अन्तर केवल इतना है – विज्ञान बाह्य जगत को मापता है, तन्त्र आन्तरिक चेतना को।
ध्वनि ही ईश्वर है, ईश्वर ही ध्वनि है
सोचिए…
जब आप मन्त्र जपते हैं, तो केवल होंठ नहीं हिल रहे होते। आप उस मूल नाद को स्पर्श कर रहे होते हैं, जिससे ब्रह्मांड बना है। आप उस असत् – उस शुद्ध शक्ति – के साथ संवाद कर रहे होते हैं।
‘ॐ’ कोई शब्द नहीं है। ‘ॐ’ वह ध्वनि है, जो सृष्टि से पहले थी, जो सृष्टि के बाद भी रहेगी।
हम प्रायः मन्त्रों को यांत्रिक रूप से दोहरा देते हैं। परन्तु उनका वास्तविक प्रभाव तभी संभव है, जब हम यह समझें कि हर अक्षर, हर ध्वनि, हर उच्चारण – चेतना का एक कंपन है।
तन्त्र की दृष्टि में इसी कंपन का नाम है नादब्रह्म।
और इसी कंपन से मन्त्रों और तन्त्र का वैज्ञानिक आधार प्रकाशित होता है।
कायदे-कानूनी सूचना
चेतावनी (Warning)
यह लेख केवल शैक्षणिक, ऐतिहासिक एवं शोध उद्देश्य के लिए है। इसमें वर्णित ध्वनि-सिद्धान्त और नाद-चेतना प्राचीन भारतीय आगमशास्त्रों एवं योगदर्शन पर आधारित हैं। किसी भी मन्त्र-साधना को बिना किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में न करें। लेखक या वेबसाइट किसी भी प्रतिकूल प्रभाव के लिए उत्तरदायी नहीं होगी।
लेखक क्रेडिट
प्रेरणा स्रोत:
पंडित देवदत्त शास्त्री कृत ‘तंत्र सिद्धांत और साधना’ (पृष्ठ 18-19),
अथर्ववेद (स्तम्भसूक्त 10.7.21), योगदर्शन (विभूतिपाद), आगमशास्त्र
ब्लॉग सारांश एवं विस्तार: KaalTatva.in टीम
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