नववधू की माफिक ध्यान स्थिर करने की सूक्ष्म प्रक्रिया

nilesh
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ध्यान करने की गुरुगम्य विधि – नेत्र उघाड़ने और बंद करने की कला


gurugamya dhyan vidhi



क्या तुमने कभी ध्यान करने की कोशिश की है? बैठते हो, आँखें बंद करते हो, और फिर क्या होता है? मन दौड़ने लगता है। कभी कल की बातें याद आती हैं, कभी आज का काम याद आता है। कभी कोई चिंता घेर लेती है, तो कभी कोई इच्छा। आँखें बंद हैं, पर मन खुला है। दौड़ रहा है। भाग रहा है।


सोचिए… इस मन को कैसे रोका जाए? कैसे उसे एक बिंदु पर स्थिर किया जाए?


प्राचीन ऋषियों और गुरुओं ने इसी समस्या का एक अद्भुत समाधान खोजा था। यह समाधान किसी पुस्तक में नहीं लिखा था। यह गुरु से शिष्य तक मौखिक रूप से (गुरुगम्य) हस्तांतरित होता था। यह कोई साधारण विधि नहीं थी। यह एक कला थी – नेत्र उघाड़ने और बंद करने की कला।


यह वही विधि है जिसे आज हम समझेंगे।

ध्यान की पहली सीढ़ी – प्रतिमा का सहारा


ध्यान करने के लिए सबसे पहले एक आधार चाहिए। बिना आधार के मन को रोकना बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसा है – जितना कोशिश करो, उतना ही मुश्किल हो जाता है।

इसलिए शास्त्र कहता है – पहले प्रतिमा (मूर्ति) को अपना आधार बनाओ। अपने इष्टदेव की प्रतिमा अपने सामने रखो। वह चाहे पत्थर की हो, धातु की हो, चाहे कागज पर बना चित्र ही हो। लेकिन वह होनी चाहिए।

यह प्रतिमा कोई साधारण मूर्ति नहीं है। यह तुम्हारे चंचल मन को रोकने की पहली रस्सी है। यह तुम्हारे भटके हुए विचारों को इकट्ठा करने का पहला बिंदु है।

जब तुम प्रतिमा के सामने बैठते हो, तो तुम्हारी आँखें उसे देखती हैं। तुम्हारा मन उसके रूप, रंग, मुद्रा, और भाव में लीन होने लगता है। यही ध्यान की शुरुआत है।



नेत्र खोलने और बंद करने की कला – गुरुगम्य रहस्य

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण रहस्य आता है। यह कोई ऐसी विधि नहीं है जो किताबों में खुलकर लिखी जाती है। यह गुरु से शिष्य को सीधे बताई जाती है। लेकिन फिर भी, इसके मूल तत्व को समझा जा सकता है।

साधक को चाहिए कि वह प्रतिमा को ध्यान से देखे। पैरों से लेकर मस्तक तक – हर अंग को, हर भाव को, हर मुद्रा को। इतनी सावधानी से देखे कि मानो वह प्रतिमा पहली बार देख रहा हो।

फिर आँखें बंद कर ले। अब कोशिश करे कि बंद आँखों में भी वही प्रतिमा देखे – ज्यों की त्यों, जैसी सामने थी।

लेकिन यहाँ समस्या आती है। बंद आँखों में प्रतिमा उतनी स्पष्ट नहीं दिखती। कुछ अंग छूट जाते हैं, कुछ रंग फीके पड़ जाते हैं, कुछ मुद्राएँ बदल जाती हैं।


अब क्या करे साधक? – यहीं पर कला काम आती है।


साधक को फिर से आँखें खोलनी चाहिए। उस अंग को, उस मुद्रा को, उस रंग को फिर से ध्यान से देखना चाहिए जो बंद आँखों में स्पष्ट नहीं दिखा। और फिर आँखें बंद करके उसे मानसिक चित्र में उकेरने का प्रयास करना चाहिए।


यह प्रक्रिया बार-बार करनी है। खोलो, देखो, बंद करो, स्मरण करो। खोलो, देखो, बंद करो, स्मरण करो।



नववधू की माफिक सावधानी

शास्त्रों में इस प्रक्रिया की तुलना नववधू (नई दुल्हन) से की गई है। जैसे कोई नई दुल्हन अपने ससुराल में बैठी हो। उसके सामने सास-ससुर, ननद-देवर, और कई रिश्तेदार बैठे हों। वह अपने पति को देखना चाहती है, लेकिन इतनी सावधानी से देखना चाहती है कि किसी को पता न चले कि वह देख रही है।


वह अपनी आँखें उतनी ही खोलती है, जितनी आवश्यक हो। पलकें झपकाते हुए, एक नज़र डालती है, और फिर तुरंत आँखें झुका लेती है। इतनी चुपके से, इतनी सूक्ष्मता से कि किसी को भान न हो।


ठीक इसी प्रकार साधक को भी अपनी आँखें खोलनी और बंद करनी चाहिए। आँखें इतनी अधिक न खोले कि घर के सारे घट-पट (चारों ओर की वस्तुएँ) भी दिखने लगें। बल्कि उतनी ही खोले, जितनी प्रतिमा को देखने के लिए आवश्यक हो।


और आँखें बंद भी इस प्रकार करे कि जैसे किसी दरवाजे पर पर्दा गिर गया हो – धीरे से, बिना शोर के, बिना झटके के। बलात् पलकें न भींचे, न आँखों पर दबाव डाले।



बंद आँखों में चित्र कैसे स्थिर करें?


जब साधक आँखें बंद करता है, तो सामने अंधेरा होता है। इस अंधेरे में दो बातें हो सकती हैं – या तो वह चित्र धुंधला दिखेगा, या फिर उसकी पुतलियाँ डोलने लगेंगी।


पुतलियाँ डोलने लगें, तो ध्यान भंग हो जाता है। मन फिर से भटकने लगता है। इसलिए आवश्यक है कि साधक अपनी दृष्टि को बंद आँखों में भी स्थिर रखे।


इसके लिए दो स्थान बताए गए हैं – हृदय प्रदेश (छाती का मध्य) और भ्रूमध्य (दोनों भौंहों के बीच का स्थान)। साधक को चाहिए कि वह अपनी बंद आँखों की दृष्टि को इनमें से किसी एक स्थान पर टिकाए।


जब दृष्टि स्थिर होती है, तो मन भी स्थिर होने लगता है। और जब मन स्थिर होता है, तो वह चित्र भी स्थिर होने लगता है।


यह आसान नहीं है। पहली बार में चित्र साफ नहीं दिखेगा। लेकिन बार-बार अभ्यास करने से – आँखें खोलना, देखना, बंद करना, स्मरण करना – एक दिन वह चित्र बंद आँखों में भी ज्यों का त्यों दिखने लगेगा। जैसे सामने रखी मूर्ति वैसी ही, हर अंग के साथ, हर रंग के साथ, हर मुद्रा के साथ।



अभ्यास और वैराग्य – दो पहिए

यह प्रक्रिया आसान नहीं है। मन बार-बार भागेगा। कभी किसी याद में, कभी किसी चिंता में, कभी किसी इच्छा में। साधक का काम होगा, उसे बार-बार पकड़कर इसी चित्र-निर्माण के काम में लगाना।


यह कोई एक दिन का काम नहीं है। यह नियमित अभ्यास (साधना) है। जितना अधिक अभ्यास करोगे, उतना अधिक मन स्थिर होगा।


साथ ही, वैराग्य भी चाहिए। वैराग्य का अर्थ है – उन विषयों (वस्तुओं, विचारों, इच्छाओं) से ऊब जाना, जिनमें मन बार-बार भागता है। जब वे विषय बेस्वाद लगने लगेंगे, तो मन उनकी ओर नहीं भागेगा। और जब मन नहीं भागेगा, तो वह स्थिर हो जाएगा।


गीता में कहा गया है – अभ्यास और वैराग्य – ये दो पहिए हैं, जिन पर ध्यान की गाड़ी चलती है। एक के बिना दूसरा अधूरा है।



पहली कच्ची से दूसरी कच्ची तक


जब साधक बंद आँखों में भी प्रतिमा का पूरा चित्र (जैसा सामने है, वैसा ही) देखने लगता है, तो समझो कि वह ध्यान की पहली कच्ची (अवस्था) में उत्तीर्ण हो गया।


अब दूसरी कच्ची शुरू होती है। अब साधक को चाहिए कि वह उस छोटे से चित्र को बड़ा करने का प्रयास करे। जैसे छोटी सी तस्वीर को बड़ा किया जाता है (एनलार्ज किया जाता है) – वैसे ही वह उस प्रतिमा को विराट रूप देने का प्रयास करे।


पहले वह प्रतिमा कुछ इंच भर की थी। अब वह उसे तीन-चार फुट का देखने लगे। फिर धीरे-धीरे उसे और बड़ा करे। जब तक कि वह प्रतिमा इतनी विशाल न दिखने लगे कि उसमें पूरा ब्रह्मांड समा जाए।


इस अवस्था में साधक को अपने इष्टदेव का विराट रूप दिखने लगता है। सूर्य-चंद्र, तारे-सितारे, पर्वत-समुद्र, सब कुछ उसी देवता के अंग-प्रत्यंग जैसे दिखने लगते हैं।


यह ध्यान की दूसरी कच्ची है।

तीसरी कच्ची – चित्र से चेतना तक


जब साधक इस अवस्था तक पहुँच जाता है, तो वह केवल एक चित्र या प्रतिमा का ध्यान नहीं कर रहा होता। वह उस चेतना का ध्यान कर रहा होता है, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है।

यह वह अवस्था है, जहाँ चित्र (प्रतिमा) और चित्रमान (विराट स्वरूप) में कोई अंतर नहीं रहता। जहाँ साधक, द्रष्टा, और दृश्य – तीनों एक हो जाते हैं।

यही ध्यान का अंतिम लक्ष्य है। यही समाधि का प्रारंभ है।



ध्यान में मन की भागदौड़ से कैसे निपटें?

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी समस्या मन की भागदौड़ है। साधक बैठता है, और मन कहीं और दौड़ जाता है। यह सामान्य है। इसे लेकर घबराना नहीं चाहिए।


योग दर्शन के अनुसार, मन स्वभाव से ही चंचल है। उसे स्थिर करना एक लंबी प्रक्रिया है। जब साधक का ध्यान भंग होता है, तो उसे कोप नहीं करना चाहिए। उसे धैर्य से, बिना उत्साह घटाए, फिर से उसी प्रक्रिया में लौटना चाहिए – नेत्र खोलना, देखना, बंद करना, स्मरण करना।

जैसे कोई माँ अपने बच्चे को बार-बार संभालती है, बिना गुस्सा किए – वैसे ही साधक को अपने मन को संभालना चाहिए।

धीरे-धीरे, दिनों-दिन, महीनों-महीनों, अभ्यास के साथ – मन स्थिर होने लगता है। वह तेज दौड़ने वाला घोड़ा धीरे-धीरे थक जाता है।



कितना समय लगेगा?


यह प्रश्न हर साधक के मन में आता है। इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है।

जो साधक एकाग्रचित्त हो, नियमित हो, एकांत में बैठता हो, और पूरे मन से इस कला को अपनाता हो – वह एक माह में पहली कच्ची पार कर सकता है।

जो साधक ढुलमुल हो, नियमित न बैठता हो, या जिसका मन अत्यधिक चंचल हो – उसे छह माह या एक वर्ष भी लग सकते हैं।

लेकिन नियम है – जितनी लगन, उतनी शीघ्रता। जितनी तत्परता, उतनी ही सफलता।


 ध्यान केवल बैठने का नाम नहीं, यह एक कला है


ध्यान करने का अर्थ केवल आँखें बंद करके बैठ जाना नहीं है। यह एक सूक्ष्म कला है – नेत्र खोलने और बंद करने की कला, मन को एक बिंदु पर टिकाने की कला, चित्र को स्मरण करने की कला।


जब तक यह कला नहीं आती, तब तक ध्यान में बैठना केवल एक औपचारिकता है। मन वैसे ही दौड़ेगा, जैसे दौड़ता था। फर्क सिर्फ इतना होगा कि आँखें बंद हैं।

इसलिए, आवश्यक है कि इस गुरुगम्य विधि को समझा जाए। इस कला को सीखा जाए। जैसे कोई नववधू सावधानी से अपने पति को देखती है, वैसे ही साधक को प्रतिमा को देखना सीखना चाहिए।

जैसे कोई चित्रकार अपने चित्र में हर बारीकी को उकेरता है, वैसे ही साधक को उस चित्र को अपने मानस में उकेरना चाहिए।


यह आसान नहीं है। लेकिन यह असंभव भी नहीं है।

सोचिए… जिस दिन यह कला आ जाएगी, उस दिन तुम्हारी आँखें बंद होंगी, पर तुम्हारी दृष्टि खुल जाएगी। उस दिन तुम केवल प्रतिमा नहीं देखोगे, उस दिन तुम उस चेतना को देखोगे, जो प्रतिमा में व्याप्त है। उस दिन तुम्हारी ध्यान साधना सफल हो जाएगी।

क्या तुमने कभी इस कला को समझकर ध्यान करने की कोशिश की है? अपने अनुभव कमेंट में साझा करें।

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प्रमुख स्रोत: मूर्तिपूजा विज्ञान ग्रंथ, योग दर्शन (पतंजलि), श्रीमद्भगवद्गीता, रणवीर भक्ति रत्नाकर


लेखक: KaalTatva.in टीम

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