प्रतिमा के सामने दीपक क्यों घुमाते हैं? आरती का वैज्ञानिक रहस्य

nilesh
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क्या तुमने कभी सोचा है कि मंदिर में जब आरती होती है, तो पुजारी दीपक को घुमाता है। शंख बजता है। घंटियाँ गूंजती हैं। भक्त हाथ उठाते हैं, ज्योति पर हाथ फेरते हैं, अपने माथे और नेत्रों पर लगाते हैं।


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सोचिए… यह सब सिर्फ एक रस्म है? या फिर इन हरकतों के पीछे कोई गहरा विज्ञान छिपा है?


आज हम उसी विज्ञान को समझेंगे – आरती के पीछे का वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक रहस्य। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है। यह प्राचीन ऋषियों द्वारा विकसित एक संपूर्ण वैज्ञानिक पद्धति है। यह पद्धति मन को एकाग्र करने, वातावरण को शुद्ध करने, और चेतना की उच्च अवस्थाओं को जागृत करने के लिए बनाई गई थी।


आरती – केवल रस्म नहीं, सृष्टि-प्रक्रिया का अभिनय

बहुत कम लोग जानते हैं कि आरती केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है। यह सृष्टि-प्रक्रिया का एक जीवंत अभिनय है।


प्राचीन ऋषियों ने गहन ध्यान और साधना के माध्यम से यह समझा था कि इस ब्रह्मांड का निर्माण एक निश्चित क्रम में हुआ है। वेद कहता है – अहमनः सकाशात् आकाशः समभूत्, आकाशाद् वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्भ्यः पृथिवी। अर्थात् ब्रह्म (चेतना) से आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश से वायु उत्पन्न हुई। वायु से अग्नि उत्पन्न हुई। अग्नि से जल उत्पन्न हुआ। और जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई।


आरती इसी सृष्टि-क्रम का एक सजीव प्रदर्शन है। जब हम आरती करते हैं, तो हम उसी प्रक्रिया को अपने सामने दोहराते हैं – आकाश से पृथ्वी तक, और फिर पृथ्वी से वापस आकाश तक। यह एक प्रकार का ध्यान है, जहाँ हम अपनी आँखों से ब्रह्मांडीय उत्पत्ति के रहस्य को देखते हैं।


इस अभिनय के माध्यम से, ऋषियों ने यह संदेश दिया कि हमारा शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। और जब हम आरती करते हैं, तो हम अपने भीतर के तत्वों को बाहरी ब्रह्मांड के तत्वों के साथ संतुलित कर रहे होते हैं। यही कारण है कि आरती के समय एक विशेष प्रकार की शांति और ऊर्जा का अनुभव होता है।


आरती में पांच तत्वों का प्रदर्शन

जब आरती शुरू होती है, तो पर्दा हटता है – सबसे पहले भगवान के दर्शन होते हैं। फिर क्रमशः पांच महाभूतों का प्रदर्शन होता है। यह क्रम कोई यादृच्छिक नहीं है। इसके पीछे एक गहरा वैज्ञानिक और दार्शनिक आधार है।


पहला – आकाश तत्व। शंख बजाया जाता है। शंख की ध्वनि आकाश (शब्द) का प्रतीक है। आकाश तत्व सबसे सूक्ष्म है, और उसका गुण शब्द है। शंख की ध्वनि उसी शब्द ब्रह्म का प्रतिनिधित्व करती है। जब शंख बजता है, तो उसकी ध्वनि चारों दिशाओं में फैलती है। यह ध्वनि तरंगें वातावरण में एक विशेष कंपन पैदा करती हैं।


दूसरा – वायु तत्व। चंवर या वस्त्र को हिलाया जाता है। यह वायु का स्पर्श है। वायु का गुण स्पर्श है, और चंवर की गति उसी स्पर्श की अनुभूति कराती है। जब चंवर हिलता है, तो हवा की हल्की-सी लहरें पूरे वातावरण में फैल जाती हैं।


तीसरा – अग्नि तत्व। दीपक या धूप जलाई जाती है। यह अग्नि का रूप और ताप है। अग्नि का गुण रूप और ताप है, और दीपक की लौ उसी का प्रतीक है। दीपक की ज्योति अंधकार को दूर करती है और वातावरण को प्रकाशित करती है।


चौथा – जल तत्व। शंख में जल भरकर चारों ओर छिड़का जाता है। यह जल का रस है। जल का गुण रस है, और शंख का जल उस रस का प्रतीक है। जल छिड़कने से वातावरण शीतल और पवित्र होता है।


पाँचवाँ – पृथ्वी तत्व। मुद्राओं के द्वारा या पैरों के स्पर्श से पृथ्वी का प्रदर्शन होता है। पृथ्वी का गुण गंध है, और मुद्राएँ उस गंध का प्रतिनिधित्व करती हैं।


यह सब क्रम उसी सृष्टि-प्रक्रिया का प्रतीक है जिसमें आकाश से पृथ्वी तक यात्रा होती है। जब हम इस क्रम को समझते हैं, तो आरती करते समय हमारा मन अनायास ही गहरे ध्यान में लीन हो जाता है।


लेकिन असली रहस्य यहाँ है


आरती केवल इतने पर ही समाप्त नहीं होती। उत्पत्ति के इस क्रम के बाद विलोम (उल्टा) क्रम भी दिखाया जाता है।


दार्शनिक सिद्धांत है कि जिस क्रम से ये तत्व उत्पन्न होते हैं, उसी उल्टे क्रम से ये एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। पृथ्वी जल में विलीन होती है। जल अग्नि में विलीन होता है। अग्नि वायु में विलीन होती है। वायु आकाश में विलीन होती है। और आकाश चेतना (ब्रह्म) में विलीन हो जाता है। अंत में केवल एक आत्मतत्व शेष रह जाता है।


आरती में भी यही दिखाया जाता है। पहले पृथ्वी का प्रदर्शन (मुद्राएँ), फिर जल का प्रदर्शन (शंख का जल छिड़कना), फिर अग्नि का प्रदर्शन (दीपक घुमाना), फिर वायु का प्रदर्शन (चंवर हिलाना), फिर आकाश का प्रदर्शन (शंख बजाना), और अंत में पुनः केवल भगवान के दर्शन।


यह पूरा अभिनय यह संदेश देता है – यह सारा ब्रह्मांड उसी एक परमात्मा की लीला है। सब कुछ उसी से आया, और सब कुछ उसी में लीन हो जाएगा। यह अद्वैत दर्शन का सबसे सरल और प्रभावशाली प्रदर्शन है।


दीपक को कितनी बार और क्यों घुमाना चाहिए?


आरती में सबसे अधिक प्रश्न यही होता है – दीपक को कितनी बार घुमाया जाए? और क्यों?


इसका उत्तर है – देवता के बीज मंत्र के आधार पर। बीज मंत्र वह मूल ध्वनि है, जो उस देवता के साथ सबसे अधिक कंपन करती है। जिस देवता की आरती हो रही है, उसके बीज मंत्र में जितने अक्षर होते हैं, उतनी ही बार दीपक घुमाना चाहिए। यदि बीज मंत्र न पता हो, तो उंकार (ॐ) को ही बीज मानकर आरती की जाती है।


विष्णु भगवान – उनके बीज मंत्र में 12 अक्षर होते हैं (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)। वे द्वादश आदित्यों में गिने जाते हैं। उनकी तिथि द्वादशी है। इसलिए विष्णु जी की आरती में दीपक को 12 बार घुमाने का विधान है।


सूर्य देव – सूर्य सात रंगों से युक्त है। उनके रथ में सात घोड़े हैं। सप्तमी तिथि उनकी है। इसलिए सूर्य देव की आरती में दीपक को 7 बार घुमाने का विधान है।


दुर्गा माँ – दुर्गा के नव रूप हैं। नव दुर्गा, नवरात्रि, नवमी तिथि। इसलिए दुर्गा माँ की आरती में दीपक को 9 बार घुमाने का विधान है।


शिव भगवान – शिव के ग्यारह रुद्र रूप हैं (एकादश रुद्र)। चतुर्दशी तिथि उनकी है। इसलिए शिव जी की आरती में दीपक को 11 या 14 बार घुमाने का विधान है।


गणेश जी – गणेश जी चतुर्थी तिथि के अधिष्ठाता हैं। इसलिए उनकी आरती में दीपक को 4 बार घुमाने का विधान है।


यदि साधारण रूप में सभी देवताओं के लिए आरती करनी हो, तो 7 बार घुमाने का विधान है – पैरों पर 4 बार, नाभि पर 2 बार, और मुख पर 1 बार।


और दीपक कैसे घुमाएँ?

यहाँ एक और गहरा रहस्य है। दीपक को केवल यूं ही नहीं घुमाना चाहिए। उसे इस प्रकार घुमाना चाहिए कि उसकी लौ ॐ अक्षर की आकृति बनाए।


बाएँ से दाएँ, दाएँ से बाएँ – दीपक के आवर्तन से प्रणव (ॐ) की रेखा बनती है। ॐ का अर्थ है समस्त ब्रह्मांड की मूल ध्वनि। जब दीपक को इस प्रकार घुमाया जाता है, तो वह पूरा वातावरण उस प्रणव ऊर्जा से आपूरित हो जाता है।


सोचिए… जब सैकड़ों भक्त एक साथ आरती में खड़े होते हैं, और पुजारी उस विधि से दीपक घुमाता है, तो उस स्थान पर कितनी शक्तिशाली ऊर्जा का संचार होता है। सभी भक्त एक साथ उसी ऊर्जा का अनुभव करते हैं। यह एक सामूहिक ध्यान (Group Meditation) है।


यही कारण है कि मंदिरों में आरती के समय भक्तों की एक अजीब सी शांति और उत्साह दोनों का अनुभव होता है।


आरती के बाद हाथ क्यों फेरते हैं?


आरती समाप्त होने पर भक्त उस ज्योति पर हाथ फेरते हैं और अपने नेत्रों और माथे पर लगाते हैं। यह भी एक वैज्ञानिक क्रिया है।

शास्त्र कहता है यथैवोच्चर्गति नित्यं राजन् दीपशिखा शुभा। दीपदातुस्तथैवोच्चंगतिर्भवति शोभना। अर्थात – जैसे दीपक की लौ नित्य ऊपर की ओर जाती है, वैसे ही आरती करने वाले भक्त को ऊर्ध्वगति (उच्च गति, उन्नति, मोक्ष) प्राप्त होती है।


जब हम दीपक की ज्योति पर हाथ फेरते हैं, तो हम उस ऊर्जा के एक अंश को अपने हाथों में लेते हैं। जब उस हाथ को अपने नेत्रों पर लगाते हैं, तो वह हमारी आध्यात्मिक आँख (तृतीय नेत्र) को खोलने का संकेत है। यह हमारी दिव्य दृष्टि को जागृत करता है।


जब उस हाथ को अपने माथे पर लगाते हैं, तो उस प्रकाश को अपनी बुद्धि में स्थापित करने का संकेत है। यह हमारे विवेक और ज्ञान को प्रखर करता है।


शंख क्यों बजाते हैं? इसका विज्ञान

आरती के समय शंख भी बजाया जाता है। इसका भी एक गहरा वैज्ञानिक कारण है।

जब शंख बजता है, तो उसकी ध्वनि एक विशिष्ट आवृत्ति (frequency) पैदा करती है। यह आवृत्ति प्रायः 1000 हर्ट्ज से अधिक होती है। यह ध्वनि तरंगें वातावरण में मौजूद हानिकारक कीटाणुओं और जीवाणुओं को नष्ट करती हैं।


शंख की ध्वनि के नियमित संपर्क में रहने से निम्नलिखित लाभ होते हैं:


हकलाने और गले के रोगों में अद्भुत लाभ होता है। शंख की ध्वनि गले के स्वरयंत्र (लैरिंक्स) को सही आवृत्ति में कंपन कराती है, जिससे वाक् संबंधी दोष दूर होते हैं।


फेफड़े (लंग्स) मजबूत बनते हैं। शंख बजाने के लिए गहरी सांस लेनी पड़ती है और जोर से सांस छोड़नी पड़ती है। यह एक प्राकृतिक प्राणायाम है, जो फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है।

दमा, कास, छर्दी, प्लीहा, यकृत रोगों में सहायक है। शंख की ध्वनि से पेट के आंतरिक अंगों की मालिश होती है, जिससे पाचन तंत्र मजबूत होता है।

प्रातः-सायं नियमित रूप से शंख बजाने से उस स्थान का वायुमंडल पूर्णतः शुद्ध हो जाता है। यही कारण है कि मंदिरों में हर सुबह-शाम शंख बजाया जाता है।


मूर्तिपूजा – केवल आरती तक ही सीमित नहीं


यह समझना बहुत आवश्यक है कि मूर्तिपूजा केवल आरती, शंख, और दीपक तक ही सीमित नहीं है। इसका समस्त विज्ञान मनोविज्ञान और आध्यात्मिकता का एक अद्भुत समन्वय है।


हमारा मन स्वभाव से ही चंचल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक सामान्य व्यक्ति का मन एक मिनट में औसतन 30 से 40 विचारों के बीच भटकता है। यदि हम इस मन को ध्यान में लगाना चाहते हैं, तो हमें एक ऐसे केंद्र की आवश्यकता है, जो हमारी पाँचों इंद्रियों को एक साथ बांध सके।


मूर्ति ठीक यही काम करती है। जब साधक मूर्ति के सामने बैठता है, तो उसकी आँखें देवता का रूप देखती हैं। कान मंत्र और शंख की ध्वनि सुनते हैं। नाक अगरबत्ती और धूप की सुगंध लेती है। जीभ प्रसाद का स्वाद लेती है। हाथ आरती और पूजन की क्रियाएँ करते हैं।


इस प्रकार, साधक की पाँचों इन्द्रियाँ उस देवता के रंग-रूप-गंध-शब्द-रस में लीन हो जाती हैं। मन को भटकने के लिए कोई दूसरा द्वार नहीं बचता। धीरे-धीरे वह चंचल मन एकाग्र होने लगता है।


जब मन एकाग्र होता है, तब चित्त शुद्ध होता है। जब चित्त शुद्ध होता है, तब आत्म-साक्षात्कार के द्वार खुलने लगते हैं। यही है मूर्तिपूजा का वैज्ञानिक रहस्य। यही है आरती का अद्भुत विज्ञान।


आरती केवल रस्म नहीं, चेतना का विज्ञान है

आरती केवल दीपक घुमाने का नाम नहीं है। यह पाँच महाभूतों की यात्रा का अभिनय है – जहाँ आकाश से पृथ्वी तक सब कुछ प्रकट होता है, और फिर वापस उसी स्रोत में विलीन हो जाता है।


जब हम उस ज्योति पर हाथ फेरते हैं, तो हम उस परम प्रकाश के एक अंश को अपने भीतर उतारते हैं। जब हम शंख सुनते हैं, तो हम अपने वातावरण और अपने शरीर को शुद्ध करते हैं। जब हम दीपक को ॐ की आकृति में घुमाते हैं, तो हम उस प्रणव को साकार करते हैं।


यह कोई अंधविश्वास नहीं है। यह प्राचीन ऋषियों का वह विज्ञान है, जिसे आधुनिक युग में भूला दिया गया। आज के युग में, जब हमारा मन पहले से कहीं अधिक चंचल और भटका हुआ है, आरती और मूर्तिपूजा का यह विज्ञान हमें एक सहारा दे सकता है।


सोचिए… जिस दिन हम इस विज्ञान को समझकर आरती करेंगे, उस दिन वह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि साक्षात् ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम बन जाएगा।

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प्रमुख स्रोत

मूर्तिपूजा विज्ञान ग्रंथ (बंगाली)

छान्दोग्य उपनिषद, रणवीर भक्ति रत्नाकर

योग दर्शन (पतंजलि)

श्रीमद्भगवद्गीता, अथर्ववेद (शंख सूक्त)

वैज्ञानिक अनुसंधान (ध्वनि आवृत्तियों का कीटाणुओं पर प्रभाव)


लेखक: KaalTatva.in टीम


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