क्या मृत्यु को जीता जा सकता है? प्राचीन तंत्र का जवाब है 'हाँ'!

nilesh
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 मौत से आमने-सामने

मृत्यु, एक ऐसा सत्य जिससे हर कोई डरता है, जिसे हर कोई टालना चाहता है। हमारे शास्त्रों और पुराणों में मृत्यु पर विजय पाने के अनेक उपाय बताए गए हैं। लेकिन क्या सच में मृत्यु को हराया जा सकता है? कश्मीर के प्राचीन शैव आगम, ‘श्रीनेत्रतंत्र’ या ‘मृत्युंजय तंत्र’ का जवाब है – हाँ, सही मार्गदर्शन और साधना से मृत्यु पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

आइए, जानते हैं इस रहस्यमयी तंत्र के बारे में।



Can death be conquered? Ancient Tantra's answer is 'Yes'!





चेतावनी (Disclaimer):

यह ब्लॉग पोस्ट केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई सभी सामग्री प्राचीन ग्रंथों 'श्री रेणुका तन्त्रम्' और 'श्री नेत्रतन्त्रम्' तथा उनकी हिंदी टीकाओं के अध्ययन पर आधारित है।

किसी भी प्रकार का मन्त्र, तान्त्रिक प्रयोग या साधना बिना किसी योग्य गुरु या आचार्य के मार्गदर्शन के न करें। इस लेख में वर्णित किसी भी प्रयास से होने वाले किसी भी शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक नुकसान के लिए ब्लॉग लेखक या प्रकाशक जिम्मेदार नहीं होंगे।

इस सामग्री का उद्देश्य किसी को गुमराह करना या किसी विशेष परिणाम की गारंटी देना नहीं है। किसी भी आध्यात्मिक क्रिया को करने से पहले स्वविवेक और विद्वानों की सलाह लेना अत्यन्त आवश्यक है।


क्या है ‘श्रीनेत्रतंत्र’?

‘श्रीनेत्रतंत्र’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक संपूर्ण साधना पद्धति है। इसे ‘मृत्युंजय भट्टारक’ और ‘अमृतेश’ के नाम से भी जाना जाता है। इस ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को हर प्रकार के दुखों, रोगों और सबसे बड़े दुख यानी मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाना है।

‘नेत्र’ का अर्थ है आँख। यहाँ नेत्र का तात्पर्य भगवान शिव के तीसरे नेत्र से है, जो समस्त सृष्टि का संहार और पुनः सृजन करता है। इस तंत्र में इन्हीं तीन नेत्रों की तीन शक्तियों – इच्छा, ज्ञान और क्रिया – को जाग्रत करने का विधान है।


मृत्युंजय मंत्र: सात करोड़ मंत्रों का राजा

‘श्रीनेत्रतंत्र’ का मूल आधार इसका प्रसिद्ध मंत्र है: ॐ जूं सः (ॐ जूँ सः)। दूसरे अध्याय में इस मंत्र के उद्धार और षडंग (हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र) का विस्तार से वर्णन मिलता है।

मान्यता है कि यह मंत्र सात करोड़ मंत्रों का राजा है। इसकी आराधना करने से:

शारीरिक और मानसिक रोग दूर होते हैं।

अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।

साधक का मन स्थिर होता है और अंत में उसे मोक्ष (मुक्ति) की प्राप्ति होती है।

साधना के तीन मार्ग: स्थूल से परम तक

यह तंत्र साधना के तीन स्तरों को समझाता है:


स्थूल योग (बाह्य साधना): इसमें होम, याग, चक्रलेखन और औषधियों के प्रयोग का वर्णन है। उदाहरण के लिए, क्षीरवृक्ष (पीपल, बरगद आदि) की समिधा से होम करने पर ज्वर मिट जाता है, और घी-दूध से होम करने से पुष्टि होती है।


सूक्ष्म योग (आंतरिक साधना): यह तांत्रिक योग का सूक्ष्म रूप है। सातवें अध्याय में शरीर के भीतर स्थित 6 चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान आदि), 16 आधारों और 12 ग्रंथियों का भेदन करके कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने की प्रक्रिया बताई गई है। जब यह शक्ति जागती है, तो साधक का शरीर अमृतमय हो जाता है और वह अजर-अमर बन जाता है।


पर योग (सर्वोच्च साधना): यह अष्टांग योग का एक विशिष्ट रूप है। इसके द्वारा साधक ‘अहं’ और ‘इदम्’ के भेद को मिटाकर सब कुछ शिवमय देखता है। यही वह अवस्था है जहाँ साधक शिवत्व को प्राप्त होता है।


क्या यह केवल सिद्धियों का ग्रंथ है?

अक्सर लोग तंत्र को केवल जादू-टोना और सिद्धियाँ प्राप्त करने का माध्यम समझते हैं। लेकिन ‘श्रीनेत्रतंत्र’ स्पष्ट शब्दों में कहता है कि इन मंत्रों का उपयोग लोभ, अहंकार या दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए करने वाला व्यक्ति नरक में जाता है।


इन मंत्रों का प्रयोग केवल आत्मरक्षा, स्वास्थ्य, रोग-निवारण और अंततः मोक्ष की प्राप्ति के लिए ही किया जाना चाहिए। यह ग्रंथ हमें सिखाता है कि सच्चा अर्थ ‘सिद्धि’ आत्म-साक्षात्कार ही है, न कि जादुई शक्तियाँ।


  एक आध्यात्मिक साहसिक यात्रा

‘श्रीनेत्रतंत्र’ केवल पढ़ने का ग्रंथ नहीं है, यह एक आध्यात्मिक साहसिक यात्रा है। यह हमें मृत्यु के प्राचीन भय से मुक्त होकर, अपने भीतर छिपी असीम शक्तियों को पहचानने का मार्ग दिखाता है।

चाहे आप साधक हों या केवल जिज्ञासु, यह ग्रंथ आपको जीवन, मृत्यु और उसके पार की सच्चाई से रूबरू कराता है।

क्या आपने कभी मृत्युंजय मंत्र का जाप किया है? इस प्राचीन तंत्र के बारे में आपके क्या विचार हैं? कमेंट करके ज़रूर बताइए।

(अस्वीकरण: यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी तांत्रिक साधना को किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।)


मूल ग्रंथ:

श्रीनेत्रतन्त्रम् (मृत्युजयभट्टारकः

आचार्य राधेश्याम चतुर्वेदी कृत 'ज्ञानवती' 

 प्रकाशक: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी (प्रथम संस्करण 2004)


संदर्भित तांत्रिक ग्रंथ:

मालिनीविजय तन्त्र

स्वच्छन्द तन्त्र

विज्ञान भैरव तन्त्र

शिव सूत्र

ईश्वर प्रत्यभिज्ञा

अन्य संदर्भित ग्रंथ:

वायु पुराण

kaaltatva.in@gmail.com

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