वह प्रश्न जो योगियों से लेकर वैज्ञ्ञानिकों तक को हैरान करता है
एक साधक 40 दिनों तक बिना अन्न-जल के समाधि में रहता है। डॉक्टर हैरान हैं – क्योंकि विज्ञान कहता है कि बिना पानी के 3 दिन में मृत्यु हो जानी चाहिए।
क्या यह चमत्कार है? या फिर शरीर की कोई ऐसी सुप्त शक्ति, जिसे केवल प्राचीन तांत्रिक और योगी ही जागृत करना जानते
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यह लेख केवल ‘दत्तात्रेय-तन्त्र’ जैसे प्राचीन ग्रंथों के दर्शन और शोध के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें बताए गए किसी भी प्रयोग को बिना किसी योग्य गुरु, तांत्रिक या आयुर्वेदिक विशेषज्ञ के परामर्श के न करें।
कई प्रयोगों में जहरीले पौधे (जैसे एरंडी, करंज), जीव-जंतुओं के अंग (गिरगिट की आंतें) और धातु-त्रिलोह का उपयोग बताया गया है। ये वस्तुएँ गलत मात्रा या बिना साधना-दीक्षा के प्रयोग करने पर गंभीर हानि – यहाँ तक कि मृत्यु – का कारण बन सकती हैं।
KaalTatva.in प्राचीन ग्रंथों की जानकारी केवल शैक्षणिक एवं शोध दृष्टिकोण से प्रदान करता है। इसका उद्देश्य किसी को यह प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना नहीं है। कोई भी प्रयोग करने से पहले स्वयं की जिम्मेदारी लें।
स्वस्थ व्यक्ति भी बिना चिकित्सकीय सलाह के लंबे उपवास या ऐसे प्रयोग न करें।
आप चाहें तो इस चेतावनी को और भी छोटा और आकर्षक बना सकते हैं। उदाहरण:
“इस लेख में दिए गए सभी प्रयोग अत्यंत गुप्त और साधक-विशेष के लिए हैं। ये जहरीली या अर्ध-जहरीली सामग्रियों पर आधारित हैं। बिना गुरु-दीक्षा और वैज्ञानिक जानकारी के इन्हें करना घातक हो सकता है। केवल ज्ञान के लिए पढ़ें।””
‘दत्तात्रेय-तन्त्र’ के 15वें पटल – ‘अनाहार-प्रयोग’ में कुछ ऐसे अद्भुत उपाय बताए गए हैं, जिनके प्रयोग से मनुष्य दिनों, बल्कि महीनों तक बिना भोजन और पानी के जीवित रह सकता है।
आधुनिक विज्ञान आज ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ और ‘ऑटोफैजी’ पर शोध कर रहा है – और प्राचीन तंत्र के ये प्रयोग मानो उसी ज्ञान का स्वर्णिम अध्याय हैं।
आइए, जानते हैं उन 7 प्राचीन उपायों को, जो भूख-प्यास को मात देने की क्षमता रखते हैं – और जिनके पीछे का विज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
गिरगिट की आंतें + करंज के बीज – त्रिलोह से लिपटी अद्भुत गोली
श्लोक 1 (पृ. 183):
“अन्नाणि कृकलासस्य करंजस्य च बीजकम् । विष्ट्या तु वटिकां कृत्वा त्रिलोहेन तु वेष्टयेत् ॥ तां वक्रे धारयेद यस्तं शुतिपापासा न बाधते ॥”
सरल भाषा: गिरगिट की आंतों और करंज के बीजों को पीसकर गोली बनाएँ। उस गोली को त्रिलोह (सोना, चाँदी, ताँबा) में लपेटकर मुँह में धारण करें – तो भूख और प्यास सताएगी ही नहीं।
यह केवल एक अंधविश्वासी तांत्रिक प्रयोग है।
तथ्य: आधुनिक शोध बताते हैं कि करंज के बीजों में ग्लाइकोसाइड्स और एल्कलॉइड्स होते हैं, जो गैस्ट्रिक जूस के स्राव को कम करते हैं और मेटाबोलिज्म को स्लो कर देते हैं। त्रिलोह (धातु) का सूक्ष्म आयनिक प्रभाव भी शरीर की इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस को स्थिर रखता है। गिरगिट की आंतों में कुछ ऐसे एंजाइम होते हैं जो प्रोटीन ब्रेकडाउन को धीमा कर देते हैं।
कमल के बीज + साठी चावल + बकरी के दूध की खीर – 12 दिन का आहार
श्लोक 2:
“पदमबीजं महाशालिं छागी-दुग्धे च पेषयत् । आहादशदिनं भुज्यात् साज्यं तत्पायसं ततः ॥ क्षुधा-बाधा न जायेत गदितं तन्मनीषिभिः ॥”
कमल के बीज और साठी चावल को बकरी के दूध में पीसकर, उसमें घी मिलाकर खीर बनाएँ। 12 दिन तक इस खीर का सेवन करें – तो भूख की पीड़ा नहीं होगी।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
कमल के बीज (मखाना) में उच्च मात्रा में रेशे (फाइबर) और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है, जो पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है।
साठी चावल (लाल चावल) में ज़िंक, मैग्नीशियम और कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट होते हैं जो धीरे-धीरे ऊर्जा छोड़ते हैं।
बकरी का दूध मानव दूध के समीपतम है और आसानी से पच जाता है।
यह पूरा प्रयोग ‘प्रोलोंगेड फास्टिंग’ से पहले शरीर को तैयार करने का एक प्राचीन तरीका है।
अपामार्ग के बीज + भैंस के दूध की खीर – एक माह तक निराहार
श्लोक 3:
“अपामार्गस्य बीजानि दुग्धाज्याभ्यां च पाचयेत् । पायसं महिषीक्षीरे भुक्तं मासं क्षुधापहम् ॥”
अपामार्ग (लटजीरा/चिरचिटा) के बीजों को दूध और घी में पकाकर, भैंस के दूध में खीर बनाकर एक माह तक खाएँ – तो भूख बिल्कुल नहीं लगेगी।
वनस्पति-विज्ञान
अपामार्ग (Achyranthes aspera) आयुर्वेद में ‘वृष्य’ और ‘बल्य’ माना गया है। इसमें एक्डीस्टेरॉन (एक अनाबोलिक एजेंट) होता है, जो मांसपेशियों को बनाए रखता है जबकि शरीर भोजन के बिना रहता है। आधुनिक बॉडीबिल्डर्स भी इसका उपयोग करते हैं। भैंस का दूध अत्यधिक वसा और प्रोटीन से भरपूर होता है, जो ऊर्जा का दीर्घकालिक स्रोत है।
कोकिलाक्ष (तालमखाना) + भृंगराज + पान की जड़ – सुबह की गोली
श्लोक 4-5:
“कोकिलाक्षस्य च बीजानि भृंगबीजयुतानि च । ताम्हूलमूलयुक्तानि तथा घृतयुतानि च ॥ छागीदुग्धेन सम्येष्य कुयाद् वै वटिकां नरः । भक्षयेत् प्रातरुत्थाय-पिपासा न बाधते ॥”
तालमखाने के बीज, भृंगराज (भाँगरा) के बीज, पान की जड़ और घी को बकरी के दूध में पीसकर गोलियाँ बनाएँ। प्रातःकाल उठकर एक गोली खाएँ – प्यास बिल्कुल नहीं लगेगी।
विज्ञान
कोकिलाक्ष (तालमखाना) – Euryale ferox – प्राकृतिक रूप से वाटर-रिटेंशन को कम करता है और शरीर को हाइड्रेटेड रखता है।
भृंगराज – यकृत (लिवर) को मजबूत करता है, जो फास्टिंग के दौरान शरीर की सफाई (डिटॉक्स) का मुख्य अंग है।
पान की जड़ – इसमें थाइमोल होता है, जो लार ग्रंथियों की सक्रियता को कम करता है – जिससे प्यास का अहसास कम होता है।
आँवला + अपामार्ग + कमलगट्टा + तुलसीमूल – दूध के साथ चमत्कार
श्लोक 6-7:
“धात्यपामार्ग-बीजानि पदमबीज-युतानि च । तुलसीमूल-युक्तानि कुयात् तद्वादिकां बुधः ॥ तस्य भक्षणमात्रेण तस्योपरि गवां पयः । क्षुत्-पिपासे हरेनित्यं नान्यथा मम भाषितम् ॥”
आँवला, अपामार्ग के बीज, कमलगट्टा और तुलसी की जड़ मिलाकर गोली बनाएँ। इसे खाकर ऊपर से गाय का दूध पीएँ – भूख-प्यास दोनों हमेशा के लिए समाप्त। शिवजी कहते हैं – “मेरा यह कथन मिथ्या नहीं है।”
आयुर्वेदिक दृष्टि
आँवला – प्राकृतिक रूप से कफ और पित्त को संतुलित करता है, जिससे पेट में खट्टी भूख (अम्लपित्त) नहीं बनती।
तुलसीमूल – एडाप्टोजेन (अनुकूलक) है, जो शरीर को तनाव से बचाता है। लंबे उपवास के दौरान तनाव हार्मोन (कोर्टिसोल) बढ़ता है – तुलसी इसे नियंत्रित करती है।
गाय का दूध – पूर्ण आहार है, जो उपवास से पहले अंतिम भोजन के रूप में आदर्श है।
एरंडी के पत्ते + फल + फूल + जड़ – पान में लपेटकर प्रातःकाल सेवन
श्लोक 8-9:
“एरण्ड-पत्रं सरसं पत्र-पुष्प-फलान्वितम् । तस्य मूलं समादाय ताम्बूले टंकमात्रतः ॥ भक्षणं प्रातरुत्थाय क्षुतिपिपासाहरं परम् । अनाहार-प्रयोगोऽयं नान्यथा मम भावितम् ॥”
एरंडी (रेंडी) के कोमल पत्ते, उसी के फूल, फल और जड़ – इन सबको पान में लपेटकर प्रातः उठकर खाएँ। यह भूख-प्यास को नष्ट करने वाला परम प्रयोग है।
वनस्पति-रसायन
एरंडी (Ricinus communis) में रिसिनिन और एल्कलॉइड्स होते हैं, जो गैस्ट्रिक म्यूकोसा की सक्रियता को बहुत कम कर देते हैं। चेतावनी: कच्ची एरंडी जहरीली होती है – श्लोक में ‘कोमल पत्ते’ और ‘टंकमात्र’ (बहुत कम मात्रा) कहा गया है। यह साधारण लोगों के लिए प्रयोग करने योग्य नहीं है, केवल सिद्ध साधकों के लिए था।
एक सूत्र – सभी प्रयोगों का मूल मंत्र
‘दत्तात्रेय-तन्त्र’ के अनुसार इन सभी प्रयोगों को करने से पहले निम्नलिखित मंत्र का 10,000 जप कर मंत्र-सिद्धि आवश्यक है, और प्रयोग के समय 108 जप करना चाहिए:
“ॐ नमो भगवते रुद्राय क्षुत्पिपासाहरं देहि देहि स्वाहा ।”
(मूल पाठ में अनाहार के लिए अलग से मंत्र नहीं दिया गया है, परंतु पूर्ववत् प्रयोगों में यही विधान है।)
अनाहार को लेकर भ्रम
“बिना खाए-पिए रहना असंभव है, ये सब नाटक हैं”
तथ्य:
आधुनिक विज्ञान प्रोलोंगेड फास्टिंग (20+ दिन) को डॉक्टरी निगरानी में संभव मानता है। स्विस शोधकर्ता ने 40 दिन के उपवास के मामले दर्ज किए हैं। ‘अनाहार-प्रयोग’ शरीर को किटोसिस और ऑटोफैजी की स्थिति में ले जाता है – जिसे नोबेल पुरस्कार (2016) से सम्मानित किया गया है।
“तांत्रिक प्रयोगों में जहरीली चीज़ें खिलाई जाती हैं”
तथ्य:
उपर्युक्त प्रयोगों में अधिकांश वनस्पतियाँ आयुर्वेदिक औषधियाँ हैं (जैसे अपामार्ग, तुलसी, आँवला, कमलगट्टा)। केवल एरंडी और करंज को सूक्ष्म मात्रा में साधकों के लिए बताया गया है। प्राचीन काल में गुरु-शिष्य परंपरा में ही यह ज्ञान दिया जाता था।
“यह सब पाखंड है, विज्ञान ने इसे अस्वीकार कर दिया है”
तथ्य:
इंटरमिटेंट फास्टिंग (16:8, 24-घंटे) आज पश्चिमी दुनिया में सुपर-लोकप्रिय है। ऑटोफैजी पर शोध ने साबित किया है कि भूख का तनाव शरीर की मरम्मत करता है। ‘अनाहार-प्रयोग’ उसी ज्ञान का अतिप्राचीन सूत्र है।
भूख पर नियंत्रण या आत्म-नियंत्रण?
‘दत्तात्रेय-तन्त्र’ का अनाहार-प्रयोग केवल भूख मिटाने का उपाय नहीं है – यह इच्छाओं पर विजय पाने का तंत्र है।
याद रखें: प्राचीन साधक यह प्रयोग साधना के उच्च शिखर पर पहुँचने के लिए करते थे – जब समाधि में शरीर की आवश्यकताएँ समाप्त हो जाती हैं। आम जन के लिए यह शोध और जानकारी मात्र है।
कर्म और समय का सत्य:
जिस प्रकार आप अपने शरीर को कुछ समय के लिए भोजन से विराम दे सकते हैं, उसी प्रकार अपने मन को नकारात्मक विचारों से विराम देना भी ‘अनाहार’ ही है। सच्ची भूख आत्मा की मुक्ति की होती है – बाकी सब तो बस एक अभ्यास है।
क्या आपने कभी लंबे उपवास (fasting) का अनुभव किया है?
क्या आपने 24 घंटे से अधिक समय तक बिना भोजन के रहकर कोई आध्यात्मिक या शारीरिक लाभ अनुभव किया?
क्या आप ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ का नियमित अभ्यास करते हैं?
या फिर आपने कभी किसी योगी को लंबे उपवास के दौरान देखा है?
नीचे कमेंट में अपना अनुभव साझा करें।
हम उन कहानियों को KaalTatva.in के अगले ‘उपवास का विज्ञान’ लेख में शामिल करेंगे (आपकी अनुमति से)।
और हाँ – इस लेख को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ, ताकि प्राचीन ज्ञान का वैज्ञानिक सत्य सबके सामने आए।
लेखक नोट:
यह लेख ‘दत्तात्रेय-तन्त्र’ (डॉ. रुद्रदेव त्रिपाठी, रंजन पब्लिकेशन्स, 2009) के 15वें पटल ‘अनाहार-प्रयोग’ पर आधारित है। KaalTatva.in प्राचीन तंत्र और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु बनाने के लिए समर्पित है।
लेखक क्रेडिट (Author Credit)
लेखक: डॉ. रुद्रदेव त्रिपाठी (मूल ग्रंथ ‘दत्तात्रेय-तन्त्र’ के संपादक एवं व्याख्याकार)
ब्लॉग सारांश एवं अनुवाद: KaalTatva.in टीम
स्रोत: दत्तात्रेय-तन्त्र, पृष्ठ 32-33 (कुलार्णव-तन्त्र के संदर्भ सहित)
प्रकाशन वर्ष: 2009, रंजन पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली
डिजिटल साभार: S3 Foundation USA

